क्या अमेरिका सचमुच ईरान से समझौते के लिए मजबूर था

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी भी समझौते को केवल शांति की इच्छा का परिणाम नहीं माना जा सकता। अधिकांश समझौते तब होते हैं जब युद्ध की कीमत शांति की कीमत से अधिक हो जाती है। 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते तथा तनाव कम करने की दिशा में उठाए गए कदमों को भी इसी दृष्टि से समझना चाहिए। दुनिया भर के मीडिया और रणनीतिक विशेषज्ञों के बीच यह प्रश्न चर्चा का विषय बना रहा कि क्या अमेरिका वास्तव में ईरान से समझौता करने के लिए मजबूर था या यह उसकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था। पहली दृष्टि में अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है। उसके पास अत्याधुनिक हथियार, विशाल नौसेना, वैश्विक सैन्य ठिकाने और आर्थिक शक्ति है। दूसरी ओर ईरान दशकों से प्रतिबंधों का सामना कर रहा देश है। ऐसे में सामान्य व्यक्ति को लग सकता है कि अमेरिका को समझौते की आवश्यकता क्यों पड़ी होगी? लेकिन भू-राजनीति केवल सैन्य शक्ति से संचालित नहीं होती। आर्थिक हित, वैश्विक व्यापार, घरेलू राजनीति, सहयोगी देशों की चिंताएँ और युद्ध की वास्तविक लागत भी निर्णयों को प्रभावित करती हैं। इसीलिए यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या अमेरिका वास्तव में ईरान के साथ समझौते के लिए विवश था? यदि हाँ, तो किन परिस्थितियों ने उसे इस दिशा में धकेला? और यदि नहीं, तो समझौते के पीछे उसकी क्या रणनीति थी? अमेरिका की शक्ति और उसकी सीमाएँ द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका विश्व की सबसे प्रभावशाली शक्ति के रूप में उभरा। सोवियत संघ के पतन के बाद तो एक समय ऐसा आया जब उसे "एकमात्र महाशक्ति" कहा जाने लगा। इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और अनेक अन्य क्षेत्रों में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेपों ने यह धारणा मजबूत की कि अमेरिका जब चाहे किसी भी देश पर दबाव बना सकता है। लेकिन इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक तक स्थिति बदल चुकी थी। अफगानिस्तान में बीस वर्ष लंबे युद्ध के बाद अमेरिका को अंततः वापसी करनी पड़ी। इराक युद्ध ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था और उसकी वैश्विक छवि दोनों को नुकसान पहुँचाया। यूक्रेन संकट, चीन का उदय और घरेलू राजनीतिक ध्रुवीकरण भी अमेरिकी शक्ति पर नए दबाव पैदा कर रहे थे। यानी अमेरिका शक्तिशाली अवश्य था, लेकिन सर्वशक्तिमान नहीं। ईरान : मध्य पूर्व की जटिल शक्ति ईरान को केवल उसके सैन्य आकार से नहीं समझा जा सकता। उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसका भूगोल है। पश्चिम एशिया के केंद्र में स्थित ईरान होरमुज़ जलडमरूमध्य के निकट है, जहाँ से विश्व के समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। यदि यह मार्ग बाधित होता है तो पूरी दुनिया प्रभावित होती है। तेल की कीमतें बढ़ती हैं। वैश्विक महँगाई बढ़ती है। ऊर्जा संकट गहराता है। यही कारण है कि ईरान के साथ किसी भी संघर्ष का प्रभाव केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहता। होरमुज़ जलडमरूमध्य : अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता ईरान के साथ तनाव बढ़ने के दौरान सबसे अधिक चिंता होरमुज़ जलडमरूमध्य को लेकर थी। विश्व की ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा भाग इसी मार्ग से होकर गुजरता है। यदि युद्ध लंबा चलता और ईरान इस मार्ग को बाधित कर देता तो तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुँच सकती थीं। अमेरिका स्वयं तेल उत्पादक देश है, लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह वैश्विक बाजार से जुड़ी हुई है। यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया और भारत जैसे अमेरिकी साझेदार देश ऊर्जा संकट का सामना करते। इसका राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव अमेरिका पर भी पड़ता। यही कारण था कि वाशिंगटन युद्ध को अनिश्चितकाल तक बढ़ने देना नहीं चाहता था। क्या अमेरिका नया अफगानिस्तान नहीं चाहता था? अफगानिस्तान का अनुभव अमेरिका के लिए अत्यंत महँगा साबित हुआ। बीस वर्षों तक चले युद्ध में खरबों डॉलर खर्च हुए। हजारों सैनिकों की जान गई। अंततः अमेरिका को उसी तालिबान के साथ समझौता करना पड़ा जिसे वह पराजित करने निकला था। इस अनुभव ने अमेरिकी नीति-निर्माताओं को सिखाया कि सैन्य विजय और राजनीतिक सफलता दो अलग-अलग बातें हैं। ईरान के साथ पूर्ण युद्ध की स्थिति में परिणाम और भी जटिल हो सकते थे। ईरान की जनसंख्या बड़ी है। उसका भूगोल कठिन है। उसके क्षेत्रीय सहयोगी और समर्थक समूह पूरे पश्चिम एशिया में सक्रिय हैं। इसलिए युद्ध शुरू करना आसान हो सकता था, लेकिन उसे समाप्त करना कठिन होता। घरेलू राजनीति का दबाव लोकतांत्रिक देशों में विदेश नीति केवल सैन्य मुख्यालयों में तय नहीं होती। जनता, संसद, मीडिया और चुनाव भी उसे प्रभावित करते हैं। अमेरिका में लंबे समय से यह भावना बढ़ रही है कि देश को विदेशों में अंतहीन युद्धों के बजाय घरेलू समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। महँगाई, रोजगार, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे जैसे मुद्दे मतदाताओं के लिए अधिक महत्वपूर्ण हैं। ऐसी स्थिति में कोई भी प्रशासन ऐसा युद्ध नहीं चाहता जो वर्षों तक चले और अरबों डॉलर खर्च कराए। इसलिए समझौते की दिशा में बढ़ना राजनीतिक दृष्टि से भी लाभदायक था। क्या ईरान भी मजबूर था? यदि यह कहा जाए कि केवल अमेरिका मजबूर था तो यह अधूरा विश्लेषण होगा। ईरान भी गंभीर आर्थिक संकटों का सामना कर रहा था। दशकों से लगे प्रतिबंधों ने उसकी अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया। विदेशी निवेश सीमित था। मुद्रा पर दबाव था। युवा आबादी रोजगार की मांग कर रही थी। इसलिए तेहरान भी तनाव कम करने का इच्छुक था। युद्ध जितना अमेरिका के लिए महँगा था, उतना ही ईरान के लिए भी विनाशकारी हो सकता था। समझौते का वास्तविक अर्थ अक्सर समझौतों को जीत और हार के चश्मे से देखा जाता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अधिकांश समझौते समझौता ही होते हैं। वे किसी एक पक्ष की पूर्ण विजय नहीं होते। अमेरिका अपने सभी उद्देश्य प्राप्त नहीं कर सका। ईरान भी अपनी सभी शर्तें मनवाने में सफल नहीं हुआ। दोनों पक्षों ने कुछ पाया और कुछ छोड़ा। यही कूटनीति का मूल सिद्धांत है। पाकिस्तान की भूमिका यहीं पर पाकिस्तान की भूमिका सामने आती है। अमेरिका और ईरान के बीच सीधे संवाद की संभावनाएँ सीमित थीं। दोनों पक्षों के बीच अविश्वास गहरा था। ऐसी स्थिति में ऐसे देशों की आवश्यकता होती है जो संवाद के चैनल बनाए रखें। पाकिस्तान ने स्वयं को इसी भूमिका में प्रस्तुत किया। इस्लामाबाद ने दावा किया कि उसने दोनों पक्षों के बीच संपर्क स्थापित करने और तनाव कम करने में सहायता की। यह उसके लिए कूटनीतिक प्रतिष्ठा बढ़ाने का अवसर था। क्या पाकिस्तान निर्णायक था? इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है। पाकिस्तान ने संवाद को प्रोत्साहित किया। लेकिन अंतिम निर्णय अमेरिका और ईरान ने स्वयं लिए। समझौते की वास्तविक आवश्यकता दोनों देशों की परिस्थितियों से उत्पन्न हुई थी। यदि अमेरिका और ईरान समझौता नहीं चाहते, तो कोई भी मध्यस्थ उन्हें मजबूर नहीं कर सकता था। इसलिए पाकिस्तान को पुल कहा जा सकता है, लेकिन मंज़िल तय करने वाला नहीं। क्या यह अमेरिका की हार थी? कई लोग इस समझौते को अमेरिका की हार के रूप में प्रस्तुत करते हैं। लेकिन यह दृष्टिकोण अत्यधिक सरलीकृत है। यदि अमेरिका का लक्ष्य तत्काल युद्ध रोकना, ऊर्जा बाजार को स्थिर रखना और क्षेत्रीय संकट को नियंत्रित करना था, तो समझौता उसकी रणनीतिक सफलता भी माना जा सकता है। दूसरी ओर यदि लक्ष्य ईरान को पूरी तरह झुकाना था, तो वह प्राप्त नहीं हुआ। इसलिए इसे पूर्ण विजय या पूर्ण पराजय कहना उचित नहीं होगा। क्या यह ईरान की जीत थी? ईरान के समर्थक इसे अपनी जीत के रूप में देखते हैं। उनका तर्क है कि भारी दबाव और सैन्य खतरे के बावजूद ईरान झुका नहीं। लेकिन ईरान भी अपनी सभी माँगें मनवाने में सफल नहीं हुआ। प्रतिबंधों, आर्थिक चुनौतियों और क्षेत्रीय दबावों का सामना उसे आगे भी करना है। इसलिए इसे भी पूर्ण विजय नहीं कहा जा सकता। शक्ति की नई परिभाषा इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सबक यह है कि आधुनिक विश्व में शक्ति केवल सैन्य क्षमता नहीं है। आर्थिक स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी क्षमता, वैश्विक व्यापार और कूटनीतिक प्रभाव भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। अमेरिका सैन्य रूप से शक्तिशाली है, लेकिन वह वैश्विक अर्थव्यवस्था की वास्तविकताओं की अनदेखी नहीं कर सकता। ईरान क्षेत्रीय शक्ति है, लेकिन वह आर्थिक चुनौतियों से मुक्त नहीं है। दोनों की सीमाएँ ही उन्हें बातचीत की मेज तक ले आईं। निष्कर्ष तो क्या अमेरिका वास्तव में ईरान से समझौते के लिए मजबूर था? उत्तर है—हाँ, लेकिन उतना ही जितना ईरान था। अमेरिका युद्ध की बढ़ती लागत, ऊर्जा संकट की आशंका, घरेलू राजनीतिक दबाव और वैश्विक अस्थिरता से चिंतित था। दूसरी ओर ईरान आर्थिक प्रतिबंधों, सैन्य दबाव और क्षेत्रीय चुनौतियों का सामना कर रहा था। इसलिए यह समझौता किसी एक पक्ष की हार या जीत नहीं था। यह उस वास्तविकता की स्वीकारोक्ति थी कि आधुनिक विश्व में सबसे शक्तिशाली राष्ट्र भी हर समस्या का समाधान युद्ध से नहीं कर सकते। अमेरिका समझौते के लिए विवश था, लेकिन पराजित नहीं। ईरान दबाव में था, लेकिन परास्त नहीं। दोनों ने युद्ध की अनिश्चितताओं पर कूटनीति की निश्चितताओं को प्राथमिकता दी। यही इस समझौते का वास्तविक अर्थ है।

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