ऊर्जा संकट के इस दौर में रेयर अर्थ मिनरल पर चीनी वर्चस्व : विश्व व्यवस्था के सामने एक बड़ी चुनौती

21वीं सदी का तीसरा दशक विश्व राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अभूतपूर्व उथल-पुथल का काल बनता जा रहा है। एक ओर जलवायु परिवर्तन की चुनौती है, दूसरी ओर ऊर्जा सुरक्षा का संकट। रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया को यह दिखा दिया कि ऊर्जा संसाधनों पर निर्भरता किस प्रकार राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं को झकझोर सकती है। यूरोप को गैस संकट का सामना करना पड़ा, तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव आया और ऊर्जा सुरक्षा वैश्विक राजनीति का केंद्रीय विषय बन गई। इसी बीच दुनिया जीवाश्म ईंधन से दूर जाकर हरित ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उन्नत रक्षा तकनीकों की ओर बढ़ रही है। इस परिवर्तन के केंद्र में एक ऐसा संसाधन खड़ा है जिसकी चर्चा आम जनता में कम होती है, लेकिन जिसकी अनुपस्थिति आधुनिक सभ्यता को ठहरा सकती है—रेयर अर्थ मिनरल। आज विश्व की सबसे बड़ी चिंता केवल यह नहीं है कि रेयर अर्थ मिनरल कहाँ हैं, बल्कि यह है कि इन पर सबसे अधिक नियंत्रण किसका है। इस प्रश्न का उत्तर है—चीन। यही कारण है कि ऊर्जा संक्रमण के इस दौर में रेयर अर्थ मिनरल पर चीनी वर्चस्व विश्व व्यवस्था के सामने एक नई और गंभीर चुनौती बनकर उभरा है। तेल से रेयर अर्थ तक : शक्ति का बदलता आधार 20वीं सदी को यदि तेल की सदी कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। मध्य पूर्व के तेल भंडारों ने विश्व राजनीति को दशकों तक प्रभावित किया। अमेरिका की विदेश नीति, खाड़ी युद्ध, ओपेक की भूमिका और वैश्विक आर्थिक संतुलन का बड़ा हिस्सा तेल के इर्द-गिर्द घूमता रहा। लेकिन 21वीं सदी की शक्ति संरचना बदल रही है। अब दुनिया की अर्थव्यवस्था डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इलेक्ट्रिक वाहनों, सेमीकंडक्टरों और हरित ऊर्जा पर आधारित होती जा रही है। इन सभी क्षेत्रों की रीढ़ रेयर अर्थ तत्व हैं। इसलिए वैश्विक शक्ति का आधार भी तेल से हटकर रेयर अर्थ संसाधनों की ओर स्थानांतरित हो रहा है। जिस प्रकार बीते युग में तेल पर नियंत्रण शक्ति का प्रतीक था, उसी प्रकार आज रेयर अर्थ मिनरल पर नियंत्रण तकनीकी और सामरिक श्रेष्ठता का आधार बन चुका है। क्या हैं रेयर अर्थ मिनरल? रेयर अर्थ मिनरल 17 धात्विक तत्वों का समूह है जिनमें नियोडिमियम, डिस्प्रोसियम, टर्बियम, लैंथेनम, सेरियम और प्रसीओडिमियम जैसे तत्व शामिल हैं। इनका उपयोग निम्न क्षेत्रों में अत्यंत महत्वपूर्ण है— इलेक्ट्रिक वाहन पवन ऊर्जा टर्बाइन सौर ऊर्जा उपकरण स्मार्टफोन और कंप्यूटर सेमीकंडक्टर उद्योग उपग्रह और अंतरिक्ष कार्यक्रम मिसाइल और रडार प्रणाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित हार्डवेयर रक्षा और एयरोस्पेस उद्योग आज कोई भी आधुनिक अर्थव्यवस्था इन तत्वों के बिना आगे नहीं बढ़ सकती। चीन ने कैसे स्थापित किया वर्चस्व? चीन का वर्तमान प्रभुत्व किसी संयोग का परिणाम नहीं है। यह लगभग चार दशकों की योजनाबद्ध रणनीति का परिणाम है। 1980 के दशक में जब अधिकांश विकसित देश इन खनिजों को सामान्य औद्योगिक संसाधन मान रहे थे, तब चीन ने इनके भविष्य के महत्व को समझ लिया था। चीन के नेता डेंग शियाओपिंग का प्रसिद्ध कथन था— "मध्य पूर्व के पास तेल है, चीन के पास रेयर अर्थ हैं।" यह कथन चीन की दीर्घकालिक रणनीतिक सोच को दर्शाता है। चीन ने तीन स्तरों पर कार्य किया— पहला, खनन क्षमता का विस्तार। दूसरा, प्रसंस्करण तकनीक का विकास। तीसरा, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर नियंत्रण। आज स्थिति यह है कि दुनिया के कई देशों में रेयर अर्थ खनिज निकाले जाते हैं, लेकिन उनका प्रसंस्करण चीन में होता है। वास्तविक शक्ति खदानों में नहीं बल्कि प्रसंस्करण संयंत्रों में निहित है और यही क्षेत्र चीन की सबसे बड़ी ताकत है। हरित ऊर्जा क्रांति और बढ़ती निर्भरता दुनिया जीवाश्म ईंधन से मुक्त होने का प्रयास कर रही है। यूरोप, अमेरिका, जापान और भारत सभी इलेक्ट्रिक वाहनों तथा नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन इस हरित ऊर्जा क्रांति का एक विरोधाभास है। जितनी अधिक दुनिया हरित ऊर्जा की ओर बढ़ेगी, उतनी ही अधिक उसकी निर्भरता रेयर अर्थ तत्वों पर बढ़ेगी। एक इलेक्ट्रिक वाहन में पारंपरिक वाहन की तुलना में कहीं अधिक रेयर अर्थ तत्वों का उपयोग होता है। पवन ऊर्जा टर्बाइन भी इन्हीं पर निर्भर हैं। इस प्रकार ऊर्जा संक्रमण की सफलता काफी हद तक उन संसाधनों पर निर्भर हो गई है जिन पर चीन का प्रभुत्व है। ऊर्जा सुरक्षा से राष्ट्रीय सुरक्षा तक रेयर अर्थ तत्व अब केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं रह गए हैं। वे राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बन चुके हैं। आधुनिक लड़ाकू विमानों, मिसाइलों, ड्रोन, रडार प्रणालियों और संचार उपकरणों में इनका व्यापक उपयोग होता है। यदि किसी देश की रक्षा उत्पादन क्षमता रेयर अर्थ आपूर्ति पर निर्भर है तो उसकी सामरिक स्वतंत्रता भी प्रभावित हो सकती है। अमेरिका इस खतरे को सबसे पहले समझने वाले देशों में से एक रहा है। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ वर्षों से चेतावनी देते रहे हैं कि चीन पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकती है। चीन का संभावित भू-राजनीतिक हथियार विश्व राजनीति में संसाधनों का उपयोग अक्सर कूटनीतिक दबाव के उपकरण के रूप में किया जाता रहा है। रूस ने गैस आपूर्ति को राजनीतिक प्रभाव के साधन के रूप में इस्तेमाल किया। तेल उत्पादक देशों ने भी समय-समय पर ऊर्जा आपूर्ति के माध्यम से प्रभाव स्थापित किया। आज आशंका यह है कि चीन भी रेयर अर्थ आपूर्ति को भू-राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग कर सकता है। यदि किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट, व्यापार युद्ध या सैन्य तनाव की स्थिति उत्पन्न होती है तो चीन निर्यात नियंत्रण का सहारा ले सकता है। ऐसी स्थिति में वैश्विक उद्योगों और रक्षा उत्पादन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। यही कारण है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश इसे केवल व्यापारिक प्रश्न नहीं बल्कि रणनीतिक चुनौती मानते हैं। अमेरिका और पश्चिम की नई रणनीति अमेरिका ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया है। नई खदानों के विकास, घरेलू प्रसंस्करण क्षमता बढ़ाने और वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखला बनाने पर विशेष बल दिया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अन्य सहयोगी देशों के साथ साझेदारी भी इसी रणनीति का हिस्सा है। यूरोपीय संघ भी अब चीन पर निर्भरता कम करने के लिए दीर्घकालिक योजनाएँ बना रहा है। लेकिन समस्या यह है कि चीन ने जो औद्योगिक आधार चार दशकों में तैयार किया है, उसकी बराबरी कुछ वर्षों में करना आसान नहीं है। भारत के सामने अवसर और चुनौती भारत के लिए यह स्थिति चुनौती भी है और अवसर भी। भारत के पास रेयर अर्थ संसाधनों की पर्याप्त संभावनाएँ हैं। विशेष रूप से तटीय क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भंडार मौजूद हैं। यदि भारत खनन और प्रसंस्करण क्षमता विकसित कर सके तो वह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भारत के लिए यह अवसर कई कारणों से महत्वपूर्ण है— आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग का विकास सेमीकंडक्टर निर्माण ऊर्जा सुरक्षा निर्यात आधारित औद्योगिक वृद्धि लेकिन इसके लिए केवल संसाधन पर्याप्त नहीं हैं। दीर्घकालिक नीति, तकनीकी निवेश और वैश्विक साझेदारी की आवश्यकता होगी। नई वैश्विक प्रतिस्पर्धा आज अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और एशिया के अनेक क्षेत्रों में रेयर अर्थ संसाधनों की खोज और निवेश तेज हो गया है। अमेरिका, यूरोप और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा अब केवल बाजारों की नहीं रही, बल्कि आपूर्ति श्रृंखलाओं की हो गई है। जिस देश के पास खदानें, प्रसंस्करण तकनीक और विनिर्माण क्षमता होगी, वही भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था में निर्णायक भूमिका निभाएगा। इस दृष्टि से रेयर अर्थ संसाधनों को लेकर चल रही प्रतिस्पर्धा को 21वीं सदी का नया "ग्रेट गेम" कहा जा सकता है। भारत के लिए सबक भारत ने लंबे समय तक तेल और गैस आयात पर अत्यधिक निर्भरता की कीमत चुकाई है। ऊर्जा संकटों ने बार-बार यह दिखाया है कि रणनीतिक संसाधनों में आत्मनिर्भरता कितनी आवश्यक है। रेयर अर्थ मिनरल के मामले में भारत के पास अभी अवसर मौजूद है। यदि समय रहते निवेश और नीतिगत पहल नहीं की गई तो भविष्य में वही स्थिति उत्पन्न हो सकती है जो कभी ऊर्जा क्षेत्र में देखने को मिली थी। भारत को खनन, प्रसंस्करण, अनुसंधान और तकनीकी नवाचार के माध्यम से एक समग्र रणनीति विकसित करनी होगी। निष्कर्ष : 21वीं सदी का नया शक्ति-संतुलन ऊर्जा संकट और हरित ऊर्जा संक्रमण के इस दौर में रेयर अर्थ मिनरल वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ चुके हैं। आधुनिक तकनीक, रक्षा उद्योग और भविष्य की अर्थव्यवस्था इन पर निर्भर होती जा रही है। ऐसे समय में इन संसाधनों पर चीन का वर्चस्व केवल आर्थिक शक्ति का प्रश्न नहीं है, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन का विषय बन गया है। जिस प्रकार बीते युग में तेल उत्पादक देशों ने विश्व राजनीति को प्रभावित किया था, उसी प्रकार आने वाले दशकों में रेयर अर्थ संसाधनों पर नियंत्रण रखने वाले देश नई विश्व व्यवस्था की दिशा तय कर सकते हैं। चीन ने इस वास्तविकता को बहुत पहले समझ लिया था। अब अमेरिका, यूरोप और भारत जैसे देश उस चुनौती का सामना करने की तैयारी कर रहे हैं। संभव है कि भविष्य के भू-राजनीतिक संघर्षों में युद्ध के मैदानों से अधिक महत्व उन खदानों, प्रसंस्करण संयंत्रों और आपूर्ति श्रृंखलाओं का हो, जहाँ से आधुनिक सभ्यता की तकनीकी शक्ति जन्म लेती है। रेयर अर्थ मिनरल पर चीनी वर्चस्व इसी उभरती हुई वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक अध्याय है।

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