चीन और पाकिस्तान की तुलना में भारत: पिछले 12 वर्षों में सैन्य तैयारी और आत्मनिर्भरता का आकलन
पिछले 12 वर्षों (2014–2026) में भारत ने "आत्मनिर्भर भारत" और "मेक इन इंडिया" के माध्यम से रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने का प्रयास किया है। इसी अवधि में चीन ने अपनी सैन्य शक्ति को और अधिक आधुनिक बनाया, जबकि पाकिस्तान ने सीमित संसाधनों के बावजूद चीन के सहयोग से अपनी सैन्य क्षमताओं का विस्तार किया। इन तीनों देशों की तुलना से स्पष्ट होता है कि भारत ने कुछ क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उसकी गति चीन से पीछे रही है और पाकिस्तान के साथ सामरिक प्रतिस्पर्धा भी बनी हुई है।
1. रक्षा बजट
चीन: रक्षा बजट में लगातार वृद्धि। आज वह अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रक्षा व्यय करने वाला देश है।
भारत: रक्षा बजट बढ़ा है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और रखरखाव पर खर्च होता है। पूंजीगत आधुनिकीकरण के लिए उपलब्ध संसाधन अपेक्षाकृत सीमित रहते हैं।
पाकिस्तान: कुल बजट छोटा है, लेकिन चीन से हथियार, तकनीक और वित्तीय सहयोग मिलने से उसकी क्षमता उसकी अर्थव्यवस्था से अधिक दिखाई देती है।
2. लड़ाकू विमान
चीन ने बड़ी संख्या में आधुनिक लड़ाकू विमान और पाँचवीं पीढ़ी के स्टील्थ विमान विकसित किए।
भारत ने स्वदेशी प्रयासों के साथ नए विमान शामिल किए, लेकिन वायुसेना अभी भी अपनी स्वीकृत स्क्वाड्रन संख्या से नीचे है।
पाकिस्तान ने चीन के साथ संयुक्त रूप से आधुनिक विमानों का उपयोग बढ़ाया और अपने बेड़े का आधुनिकीकरण किया।
3. नौसेना
चीन आज विश्व की सबसे बड़ी नौसेनाओं में से एक है। उसने विमानवाहक पोत, परमाणु पनडुब्बियाँ और बड़े युद्धपोत बड़ी संख्या में बनाए हैं।
भारत ने स्वदेशी विमानवाहक पोत, युद्धपोत और पनडुब्बी निर्माण में प्रगति की है, लेकिन संख्या और औद्योगिक क्षमता के मामले में चीन से काफी पीछे है।
पाकिस्तान ने चीन की सहायता से अपनी नौसैनिक क्षमता में वृद्धि की है।
4. मिसाइल और अंतरिक्ष
यह वह क्षेत्र है जहाँ भारत ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है।
भारत की बैलिस्टिक मिसाइलें, क्रूज़ मिसाइलें, उपग्रह प्रक्षेपण क्षमता और अंतरिक्ष कार्यक्रम मजबूत हुए हैं। इस क्षेत्र में भारत पाकिस्तान से स्पष्ट रूप से आगे है, जबकि चीन अभी भी तकनीकी और औद्योगिक पैमाने पर बढ़त बनाए हुए है।
5. ड्रोन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता
आधुनिक युद्ध में ड्रोन निर्णायक बन चुके हैं।
चीन इस क्षेत्र में वैश्विक अग्रणी देशों में है।
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में तेज़ प्रगति की है, लेकिन अभी भी बड़े पैमाने पर उत्पादन और उच्च तकनीक में निवेश की आवश्यकता है।
पाकिस्तान ने भी चीन और तुर्किये के सहयोग से अपनी ड्रोन क्षमता बढ़ाई है।
6. रक्षा उद्योग
यही सबसे महत्वपूर्ण अंतर है।
चीन
इंजन, जहाज, विमान, इलेक्ट्रॉनिक्स और मिसाइलों का विशाल घरेलू उद्योग।
बड़े पैमाने पर उत्पादन क्षमता।
भारत
स्वदेशीकरण बढ़ा है।
रक्षा निर्यात में वृद्धि हुई है।
निजी उद्योग की भागीदारी बढ़ी है।
फिर भी जेट इंजन, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और कुछ महत्वपूर्ण प्रणालियों में विदेशी निर्भरता बनी हुई है।
पाकिस्तान
रक्षा उद्योग सीमित है।
अधिकांश उन्नत तकनीक चीन पर निर्भर है।
7. सीमा अवसंरचना
पिछले 12 वर्षों में भारत ने सीमावर्ती सड़कों, सुरंगों, पुलों और हवाई पट्टियों का उल्लेखनीय विस्तार किया है। इससे सीमाओं पर सेना की त्वरित तैनाती की क्षमता बढ़ी है। फिर भी चीन ने तिब्बत क्षेत्र में रेल, सड़क, हवाई अड्डों और सैन्य ढाँचे का विकास कहीं अधिक व्यापक स्तर पर किया है।
क्या आत्मनिर्भरता ने भारत की गति धीमी की?
यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि केवल आत्मनिर्भरता के कारण सैन्य प्रगति धीमी हुई। वास्तविकता यह है कि—
कुछ परियोजनाएँ स्वदेशी विकास में अपेक्षा से अधिक समय लेती हैं।
रक्षा खरीद प्रक्रिया अभी भी जटिल है।
अनुसंधान एवं विकास में निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है।
निजी क्षेत्र की क्षमता का पूरा उपयोग अभी बाकी है।
दूसरी ओर, यदि भारत आत्मनिर्भरता का प्रयास न करता, तो भविष्य में विदेशी निर्भरता उसकी रणनीतिक कमजोरी बन सकती थी।
निष्कर्ष
पिछले 12 वर्षों में भारत ने रक्षा क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल की हैं, विशेषकर मिसाइल, अंतरिक्ष, नौसैनिक निर्माण और रक्षा निर्यात में। किंतु यदि तुलना चीन से की जाए, तो स्पष्ट है कि चीन का रक्षा औद्योगिक आधार, उत्पादन क्षमता और सैन्य आधुनिकीकरण कहीं अधिक तेज़ रहा है। पाकिस्तान, अपनी छोटी अर्थव्यवस्था के बावजूद, चीन के सहयोग से कुछ क्षेत्रों में अपनी सैन्य क्षमता बनाए रखने में सफल रहा है।
इसलिए भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल हथियार खरीदना नहीं, बल्कि तेज़ निर्णय, उच्च तकनीकी अनुसंधान, मजबूत रक्षा उद्योग, पर्याप्त निवेश और समयबद्ध उत्पादन सुनिश्चित करना है। तभी आत्मनिर्भरता और सैन्य शक्ति एक-दूसरे के पूरक बन सकेंगे, न कि परस्पर विरोधी।









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