क्या अमेरिका–ईरान समझौता इज़राइल के लिए खतरे की घंटी है?

मध्य-पूर्व की बदलती राजनीति और इज़राइल की बढ़ती चिंताएँ मध्य-पूर्व की राजनीति में जब भी अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत या समझौते की खबर आती है, सबसे अधिक बेचैनी इज़राइल में दिखाई देती है। दशकों से इज़राइल ईरान को अपने अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता रहा है। दूसरी ओर अमेरिका, जो इज़राइल का सबसे बड़ा सहयोगी है, कई बार ईरान के साथ बातचीत और समझौते का रास्ता चुनता रहा है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच होने वाला कोई भी समझौता इज़राइल के लिए खतरे की घंटी है? इस प्रश्न का उत्तर केवल "हाँ" या "नहीं" में नहीं दिया जा सकता। इसके पीछे इतिहास, भू-राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा, परमाणु कार्यक्रम, सैन्य संतुलन और महाशक्तियों के हितों का जटिल ताना-बाना मौजूद है। इज़राइल और ईरान: दुश्मनी की पृष्ठभूमि 1979 की ईरानी इस्लामी क्रांति से पहले ईरान और इज़राइल के संबंध अपेक्षाकृत सामान्य थे। लेकिन क्रांति के बाद नई इस्लामी सरकार ने इज़राइल को अपना प्रमुख शत्रु घोषित कर दिया। तब से ईरान लगातार फिलिस्तीनी मुद्दे का समर्थन करता रहा है और इज़राइल की नीतियों की आलोचना करता रहा है। दूसरी ओर इज़राइल ईरान को अपने राष्ट्रीय अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बताता है। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष युद्ध भले न हुआ हो, लेकिन छाया युद्ध, साइबर हमले, खुफिया अभियान और क्षेत्रीय संघर्ष लगातार चलते रहे हैं। अमेरिका की दुविधा अमेरिका के सामने एक बड़ी समस्या है। एक ओर वह इज़राइल का सबसे बड़ा मित्र और सुरक्षा साझेदार है। दूसरी ओर वह मध्य-पूर्व में लगातार युद्धों से थक चुका है। इराक, अफगानिस्तान, सीरिया और अन्य संघर्षों ने अमेरिका को यह सिखाया है कि हर समस्या का समाधान सैन्य कार्रवाई नहीं हो सकता। यही कारण है कि वॉशिंगटन कई बार ईरान के साथ कूटनीतिक संवाद का रास्ता चुनता है। अमेरिका का मानना है कि यदि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को बातचीत के माध्यम से सीमित किया जा सके तो युद्ध की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। लेकिन इज़राइल इस दृष्टिकोण से पूरी तरह सहमत नहीं रहा है। इज़राइल की सबसे बड़ी चिंता: परमाणु कार्यक्रम इज़राइल की नजर में ईरान का परमाणु कार्यक्रम सबसे बड़ा खतरा है। इज़राइली रणनीतिकारों का तर्क है कि यदि ईरान परमाणु हथियार बनाने में सफल हो गया तो पूरे मध्य-पूर्व का शक्ति संतुलन बदल जाएगा। इज़राइल स्वयं को ऐसे क्षेत्र में पाता है जहाँ उसके अधिकांश पड़ोसी कभी न कभी उसके विरोधी रहे हैं। इसलिए वह किसी भी ऐसी स्थिति को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है जिसमें ईरान परमाणु शक्ति बन जाए। इसी कारण इज़राइल ने अतीत में इराक और सीरिया के परमाणु ठिकानों पर हमले किए थे। समझौते से इज़राइल क्यों चिंतित होता है? जब अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की बात होती है तो इज़राइल के सामने कई प्रश्न खड़े हो जाते हैं। 1. आर्थिक प्रतिबंधों में ढील यदि समझौते के बाद ईरान पर लगे प्रतिबंध हटते हैं तो उसकी अर्थव्यवस्था मजबूत हो सकती है। अधिक आर्थिक संसाधनों का अर्थ है अधिक सैन्य निवेश, अधिक तकनीकी क्षमता और क्षेत्रीय प्रभाव में वृद्धि। इज़राइल को डर रहता है कि इससे ईरान और अधिक शक्तिशाली हो जाएगा। 2. क्षेत्रीय प्रभाव का विस्तार ईरान पहले से ही मध्य-पूर्व के कई देशों में प्रभाव रखता है। यदि आर्थिक स्थिति मजबूत होती है तो उसका क्षेत्रीय प्रभाव और बढ़ सकता है। इज़राइल के लिए यह एक दीर्घकालिक सुरक्षा चुनौती के रूप में देखा जाता है। 3. समय खरीदने की रणनीति इज़राइल के कई विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान कभी-कभी बातचीत का उपयोग समय प्राप्त करने के लिए करता है। उनके अनुसार समझौते के दौरान ईरान अपनी तकनीकी क्षमता को बनाए रख सकता है और भविष्य में फिर से कार्यक्रम को आगे बढ़ा सकता है। अमेरिका का तर्क क्या है? अमेरिका का दृष्टिकोण कुछ अलग है। वॉशिंगटन मानता है कि बिना समझौते के स्थिति और अधिक खतरनाक हो सकती है। यदि कोई समझौता नहीं होता तो: परमाणु कार्यक्रम पर निगरानी कम हो सकती है। युद्ध की संभावना बढ़ सकती है। तेल बाजार में अस्थिरता आ सकती है। वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इसलिए अमेरिका नियंत्रित और सत्यापित समझौते को बेहतर विकल्प मानता है। क्या इज़राइल की चिंताएँ सही हैं? काफी हद तक हाँ। हर देश अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर सोचता है। इज़राइल की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वह सुरक्षा के मामलों में अत्यधिक सतर्क रहता है। उसके लिए किसी भी संभावित खतरे को प्रारंभिक स्तर पर रोकना आवश्यक माना जाता है। इसी कारण इज़राइल की चिंताएँ केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं हैं बल्कि उसकी सुरक्षा नीति का हिस्सा हैं। क्या समझौता इज़राइल के लिए लाभदायक भी हो सकता है? इस प्रश्न का उत्तर भी "हाँ" है। यदि समझौता वास्तव में प्रभावी हो और उसके तहत: कठोर निरीक्षण हो, परमाणु गतिविधियों पर नियंत्रण हो, अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को निगरानी का अधिकार मिले, तो इससे इज़राइल की सुरक्षा बढ़ भी सकती है। क्योंकि बिना समझौते की स्थिति में किसी को यह पता नहीं होगा कि ईरान क्या कर रहा है। युद्ध का विकल्प कितना खतरनाक? यदि समझौता विफल हो जाता है तो अगला विकल्प क्या होगा? कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसी स्थिति में सैन्य संघर्ष की संभावना बढ़ सकती है। युद्ध की स्थिति में: तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। वैश्विक व्यापार प्रभावित हो सकता है। खाड़ी क्षेत्र अस्थिर हो सकता है। अमेरिका सीधे संघर्ष में खिंच सकता है। इज़राइल लगातार मिसाइल हमलों के खतरे में आ सकता है। इसलिए कुछ रणनीतिकार समझौते को "खराब विकल्पों में सबसे बेहतर विकल्प" मानते हैं। क्या अमेरिका इज़राइल को धोखा दे रहा है? इज़राइल में कुछ राजनीतिक समूह समय-समय पर ऐसा आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन वास्तविकता अधिक जटिल है। अमेरिका और इज़राइल के बीच रक्षा, तकनीक, खुफिया सहयोग और सैन्य साझेदारी अत्यंत मजबूत है। अमेरिका हर वर्ष इज़राइल को अरबों डॉलर की सुरक्षा सहायता प्रदान करता है। इसलिए यह कहना कठिन है कि अमेरिका इज़राइल को छोड़ रहा है। बल्कि अमेरिका दो विरोधी लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है— इज़राइल की सुरक्षा। क्षेत्रीय स्थिरता। चीन और रूस का प्रभाव मध्य-पूर्व की राजनीति अब केवल अमेरिका और इज़राइल तक सीमित नहीं है। चीन और रूस भी क्षेत्र में अपनी भूमिका बढ़ा रहे हैं। यदि अमेरिका ईरान के साथ संवाद नहीं करता तो ईरान पूरी तरह चीन और रूस के प्रभाव क्षेत्र में जा सकता है। अमेरिका इस संभावना से भी बचना चाहता है। यही कारण है कि कूटनीति उसके लिए सामरिक आवश्यकता भी है। अरब देशों का बदलता दृष्टिकोण एक समय था जब अधिकांश अरब देश इज़राइल के विरोध में एकजुट दिखाई देते थे। लेकिन आज स्थिति बदल रही है। कई अरब देश: आर्थिक विकास, निवेश, तकनीक, व्यापार पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। इसलिए क्षेत्रीय राजनीति पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यावहारिक हो चुकी है। क्या इज़राइल सैन्य कार्रवाई कर सकता है? यदि इज़राइल को लगे कि ईरान परमाणु हथियार बनाने के बहुत करीब पहुँच गया है तो वह सैन्य कार्रवाई पर विचार कर सकता है। लेकिन यह विकल्प आसान नहीं है। ईरान विशाल क्षेत्रफल, बड़ी जनसंख्या और मजबूत सैन्य क्षमताओं वाला देश है। ऐसी किसी कार्रवाई के परिणाम पूरे क्षेत्र को प्रभावित कर सकते हैं। भारत के लिए इसका क्या अर्थ है? भारत के लिए अमेरिका–ईरान संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। भारत के: ऊर्जा हित, खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीय, व्यापारिक मार्ग, पश्चिम एशिया नीति सभी इस क्षेत्र की स्थिरता से जुड़े हुए हैं। भारत नहीं चाहेगा कि मध्य-पूर्व एक और बड़े युद्ध की ओर बढ़े। निष्कर्ष अमेरिका–ईरान समझौता अपने आप में इज़राइल के लिए खतरे की घंटी नहीं है। असली प्रश्न यह है कि समझौते की शर्तें क्या हैं और उनका पालन किस प्रकार किया जाता है। यदि समझौता ईरान को बिना पर्याप्त निगरानी के आर्थिक और सामरिक लाभ देता है, तो इज़राइल की चिंताएँ स्वाभाविक हैं। लेकिन यदि समझौता कठोर निरीक्षण, पारदर्शिता और परमाणु कार्यक्रम पर प्रभावी नियंत्रण सुनिश्चित करता है, तो वही समझौता इज़राइल की सुरक्षा को भी मजबूत कर सकता है। वास्तव में इज़राइल के लिए सबसे बड़ा खतरा केवल समझौता नहीं, बल्कि ऐसा समझौता है जो कागज पर तो मौजूद हो लेकिन व्यवहार में ईरान की क्षमताओं को सीमित न कर सके। यही कारण है कि हर अमेरिका–ईरान वार्ता को तेल अवीव में बेहद गंभीरता से देखा जाता है। मध्य-पूर्व की राजनीति में मित्रता और शत्रुता स्थायी नहीं होतीं, लेकिन राष्ट्रीय हित हमेशा स्थायी रहते हैं। अमेरिका, ईरान और इज़राइल—तीनों की नीतियों को समझने का सबसे अच्छा तरीका भी यही है।

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