टाइम-100 से नरेंद्र मोदी की अनुपस्थिति: क्या बदल रही है वैश्विक प्रभाव की राजनीति?

 

विश्व राजनीति में किसी नेता की लोकप्रियता और उसका वैश्विक प्रभाव हमेशा एक ही बात नहीं होते। कोई नेता अपने देश में अत्यंत लोकप्रिय हो सकता है, अनेक चुनाव जीत सकता है और विशाल जनसमर्थन रख सकता है, फिर भी अंतरराष्ट्रीय प्रभाव का मूल्यांकन करने वाली सूचियों में उसकी उपस्थिति या अनुपस्थिति अलग-अलग कारणों से तय होती है। यही प्रश्न उस समय उठता है जब Narendra Modi का नाम TIME की TIME100 जैसी चर्चित सूची में किसी वर्ष दिखाई नहीं देता। क्या इसका अर्थ यह है कि उनका वैश्विक प्रभाव कम हो गया है? या यह केवल उस वर्ष की संपादकीय प्राथमिकताओं का परिणाम है?


सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि TIME100 दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोगों की सूची नहीं है। यह उन व्यक्तियों की सूची है जिन्हें TIME के संपादक उस वर्ष विश्व पर सबसे अधिक प्रभाव डालने वाला मानते हैं। इसमें राजनीति के अलावा विज्ञान, प्रौद्योगिकी, कला, व्यवसाय, खेल और सामाजिक आंदोलनों से जुड़े लोग भी शामिल होते हैं। इसलिए इसमें किसी नेता का न होना अपने-आप में उसकी शक्ति या महत्व का अंतिम प्रमाण नहीं है।


नरेंद्र मोदी पहले भी TIME100 में शामिल हो चुके हैं और TIME के मुखपृष्ठ पर भी स्थान पा चुके हैं। इसका अर्थ है कि पत्रिका ने विभिन्न समयों पर उनके प्रभाव को स्वीकार किया है। इसलिए किसी एक वर्ष अनुपस्थिति को स्थायी निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।


फिर भी यह प्रश्न विचारणीय है कि किन परिस्थितियों में कोई वैश्विक नेता ऐसी सूची से बाहर रह सकता है।


पहला कारण यह है कि वैश्विक प्रभाव का आकलन वर्ष विशेष की घटनाओं के आधार पर होता है। यदि किसी वर्ष अंतरराष्ट्रीय राजनीति का केंद्र किसी बड़े युद्ध, तकनीकी क्रांति, वैज्ञानिक उपलब्धि या मानवीय संकट पर केंद्रित हो, तो उन घटनाओं से जुड़े व्यक्तियों को प्राथमिकता मिल सकती है। ऐसे में अन्य प्रभावशाली नेता भी सूची से बाहर रह सकते हैं।


दूसरा कारण संपादकीय दृष्टिकोण है। TIME100 किसी गणितीय सूत्र से नहीं बनती। यह संपादकीय चयन है, जिसमें पत्रकारिता की समझ, वैश्विक विमर्श और उस समय की प्रमुख घटनाओं को महत्व दिया जाता है। अलग-अलग संस्थाएँ अलग-अलग मानदंड अपनाती हैं। इसलिए एक सूची में शामिल व्यक्ति दूसरी सूची में अनुपस्थित हो सकता है।


तीसरा कारण यह है कि किसी नेता का वैश्विक प्रभाव केवल उसकी घरेलू लोकप्रियता से नहीं मापा जाता। अंतरराष्ट्रीय संकटों में उसकी भूमिका, वैश्विक संस्थाओं पर उसका प्रभाव, अन्य देशों के साथ उसके संबंध और विश्व स्तर पर उसके निर्णयों की प्रतिध्वनि भी महत्वपूर्ण होती है।


भारत आज विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में है। उसकी जनसंख्या, आर्थिक वृद्धि, डिजिटल परिवर्तन, अंतरिक्ष कार्यक्रम और वैश्विक मंचों पर सक्रियता ने उसकी स्थिति को मजबूत किया है। जी-20 की अध्यक्षता जैसे अवसरों ने भारत की भूमिका को भी प्रमुखता दी। इन उपलब्धियों के कारण नरेंद्र मोदी की अंतरराष्ट्रीय पहचान भी बढ़ी है।


इसके बावजूद आलोचक यह तर्क देते हैं कि केवल घरेलू राजनीतिक सफलता वैश्विक प्रभाव का पर्याय नहीं होती। वैश्विक प्रभाव का अर्थ है—क्या किसी नेता के निर्णय विश्व की दिशा बदल रहे हैं? क्या वह अंतरराष्ट्रीय संकटों के समाधान में निर्णायक भूमिका निभा रहा है? क्या उसके विचार वैश्विक नीति निर्माण को प्रभावित कर रहे हैं?


समर्थकों का मत अलग है। उनके अनुसार भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था, विदेश नीति की सक्रियता, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा और वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज़ बनने के प्रयास नरेंद्र मोदी के प्रभाव को स्पष्ट करते हैं। इसलिए किसी एक पत्रिका की सूची उनके महत्व का अंतिम पैमाना नहीं हो सकती।


यह भी ध्यान रखना चाहिए कि TIME100 जैसी सूचियाँ स्वयं भी बहस का विषय रहती हैं। कई बार उनमें शामिल और बाहर किए गए नामों पर विवाद होता है। अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के लोग संपादकीय निर्णयों की अलग-अलग व्याख्या करते हैं। इसलिए ऐसी सूचियों को अंतिम सत्य के बजाय एक प्रभावशाली संपादकीय आकलन के रूप में देखना अधिक उचित है।


भारत के संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है। क्या किसी भारतीय नेता की वैश्विक प्रतिष्ठा केवल विदेशी पत्रिकाओं की मान्यता से तय होनी चाहिए? शायद नहीं। किसी भी लोकतांत्रिक नेता का सबसे बड़ा मूल्यांकन उसके नागरिक करते हैं। अंतरराष्ट्रीय मान्यता महत्वपूर्ण है, लेकिन वह एकमात्र कसौटी नहीं हो सकती।


दूसरी ओर, वैश्विक छवि को भी पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। आज निवेश, प्रौद्योगिकी, कूटनीति और रणनीतिक साझेदारियाँ किसी देश की अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता से भी प्रभावित होती हैं। इसलिए वैश्विक मीडिया और नीति समुदाय में किसी नेता की धारणा का महत्व बना रहता है।


नरेंद्र मोदी के समर्थक यह भी कहते हैं कि कई पश्चिमी मीडिया संस्थान भारत की राजनीति को अपने दृष्टिकोण से देखते हैं, जिससे उनके मूल्यांकन में मतभेद दिखाई दे सकते हैं। वहीं आलोचकों का कहना है कि वैश्विक मीडिया का काम प्रश्न उठाना और सत्ता का मूल्यांकन करना है। दोनों पक्षों के तर्क लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा हैं।


अंततः यह समझना आवश्यक है कि TIME100 जैसी सूची में शामिल होना सम्मान की बात हो सकती है, लेकिन उससे बाहर होना किसी नेता की वैश्विक भूमिका के समाप्त होने का प्रमाण नहीं है। उसी प्रकार सूची में शामिल होना यह भी सिद्ध नहीं करता कि वही व्यक्ति सबसे प्रभावशाली है।


निष्कर्षतः, नरेंद्र मोदी की किसी वर्ष TIME100 से अनुपस्थिति को उनके समग्र वैश्विक प्रभाव का अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता। यह एक वार्षिक संपादकीय चयन है, जो उस समय की वैश्विक घटनाओं, प्रभाव के आकलन और पत्रिका के संपादकीय विवेक पर आधारित होता है। भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका, उसकी अर्थव्यवस्था, उसकी कूटनीति और उसकी रणनीतिक स्थिति का मूल्यांकन कहीं अधिक व्यापक मानकों पर किया जाना चाहिए। इसलिए किसी एक सूची के आधार पर न तो अत्यधिक उत्साहित होने की आवश्यकता है और न ही अत्यधिक निराश होने की। वैश्विक प्रभाव अंततः दीर्घकालिक नीतियों, संस्थागत शक्ति और विश्व समुदाय के साथ रचनात्मक सहभागिता से निर्मित होता है।

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