जी-7 की मेज पर भारत, पर इंडो-पैसिफिक से दूरी?
कूटनीतिक उपलब्धि और रणनीतिक चुनौती का द्वंद्व
हाल ही में जी-7 शिखर सम्मेलन में भारत की उपस्थिति को सरकार और उसके समर्थकों ने भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रमाण बताया। वास्तव में, यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है कि विश्व की सात सबसे विकसित अर्थव्यवस्थाओं के समूह में भारत को लगातार आमंत्रित किया जाता है। यह संकेत है कि दुनिया भारत को केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक समीकरणों के महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में देख रही है।
लेकिन इसी समय एक दूसरी खबर ने ध्यान आकर्षित किया। इंडो-पैसिफिक रणनीति, जिसे पिछले एक दशक से भारत-अमेरिका साझेदारी का प्रमुख आधार बताया जाता रहा था, उसमें भारत की भूमिका को लेकर नए प्रश्न उठने लगे हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका की प्राथमिकताएँ बदल रही हैं और वह भारत को अब पहले जैसी केंद्रीय स्थिति में नहीं देख रहा। यदि यह धारणा सही है, तो जी-7 की चमक के पीछे छिपी रणनीतिक चुनौतियों को समझना आवश्यक हो जाता है।
जी-7 में भारत की उपस्थिति: सम्मान या आवश्यकता?
जी-7 मूलतः विकसित औद्योगिक देशों का समूह है। भारत इसका सदस्य नहीं है, फिर भी पिछले वर्षों में उसे लगातार आमंत्रित किया गया है। इसका कारण केवल भारत का आर्थिक आकार नहीं, बल्कि उसकी भू-राजनीतिक स्थिति भी है।
विश्व अर्थव्यवस्था का केंद्र धीरे-धीरे एशिया की ओर खिसक रहा है। चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए पश्चिमी देशों को भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश की आवश्यकता है। भारत विशाल बाजार भी है और तकनीकी, रक्षा तथा आपूर्ति श्रृंखला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भागीदार भी।
इस दृष्टि से जी-7 में भारत की उपस्थिति सम्मान के साथ-साथ पश्चिमी देशों की रणनीतिक आवश्यकता भी है।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या भारत इस मंच पर केवल आमंत्रित अतिथि है, या वह वास्तव में वैश्विक निर्णय-निर्माण को प्रभावित करने की स्थिति में पहुँच रहा है?
यदि भारत केवल तस्वीरों, संयुक्त वक्तव्यों और औपचारिक बैठकों तक सीमित रहता है, तो यह उपस्थिति प्रतीकात्मक रह जाएगी। वास्तविक उपलब्धि तब होगी जब भारत वैश्विक आर्थिक नियमों, जलवायु वित्त, व्यापार व्यवस्था और सुरक्षा नीति के निर्धारण में निर्णायक प्रभाव डाल सके।
इंडो-पैसिफिक: भारत की केंद्रीय भूमिका पर प्रश्न
पिछले कुछ वर्षों में "इंडो-पैसिफिक" शब्द भारत की विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया था। अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर भारत को इस क्षेत्र में चीन के प्रभाव को संतुलित करने वाली शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया।
क्वाड की बैठकों, संयुक्त सैन्य अभ्यासों और रणनीतिक साझेदारियों ने यह धारणा मजबूत की कि अमेरिका भारत को एशिया में अपना प्रमुख साझेदार मानता है।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति स्थायी मित्रताओं से नहीं, बदलते हितों से संचालित होती है।
यदि अमेरिका को लगता है कि भारत रूस से संबंध पूरी तरह नहीं तोड़ सकता, चीन के साथ खुला टकराव नहीं चाहता और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता पर अडिग है, तो वह अपनी योजनाओं में अन्य विकल्पों को भी महत्व दे सकता है।
यही वह बिंदु है जहाँ भारत और अमेरिका की अपेक्षाएँ अलग-अलग दिखाई देती हैं।
अमेरिका चाहता है कि भारत चीन के विरुद्ध अधिक स्पष्ट रणनीतिक भूमिका निभाए।
भारत चाहता है कि वह अमेरिका के साथ सहयोग करे, लेकिन किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा न बने।
यह अंतर धीरे-धीरे दोनों देशों के संबंधों में तनाव का कारण बन सकता है।
रणनीतिक स्वायत्तता की कीमत
भारत की विदेश नीति का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत रणनीतिक स्वायत्तता रहा है।
भारत रूस से हथियार खरीदता है, अमेरिका से तकनीक लेता है, यूरोप के साथ व्यापार बढ़ाता है और वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व करने की बात करता है। यह बहुध्रुवीय नीति भारत को लचीलापन देती है।
लेकिन इसकी एक कीमत भी है।
महाशक्तियाँ अक्सर स्पष्ट प्रतिबद्धताएँ चाहती हैं। उन्हें ऐसे साझेदार पसंद आते हैं जो संकट के समय बिना शर्त उनके साथ खड़े हों।
भारत ऐसा नहीं करता।
यही कारण है कि कभी-कभी पश्चिमी देशों में यह धारणा बनती है कि भारत एक "विश्वसनीय साझेदार" तो है, लेकिन "संपूर्ण सहयोगी" नहीं।
जी-7 और वास्तविक चुनौती
जी-7 में आमंत्रण भारत की बढ़ती हैसियत का प्रमाण है, लेकिन वह स्वयं में कोई रणनीतिक उपलब्धि नहीं है।
वास्तविक चुनौती यह है कि भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को बनाए रखते हुए वैश्विक शक्ति संरचना में प्रभावशाली स्थान कैसे प्राप्त करे।
यदि भारत केवल पश्चिमी मंचों पर उपस्थित रहने को ही सफलता मान लेता है, तो वह अपने दीर्घकालिक हितों को सीमित कर देगा।
लेकिन यदि वह इन मंचों का उपयोग वैश्विक दक्षिण, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और न्यायपूर्ण आर्थिक ढाँचे की वकालत के लिए करता है, तो उसकी भूमिका कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।
निष्कर्ष
जी-7 में भारत की उपस्थिति निस्संदेह उसकी बढ़ती वैश्विक पहचान का संकेत है। लेकिन कूटनीति केवल निमंत्रणों से नहीं, प्रभाव से मापी जाती है।
दूसरी ओर, यदि इंडो-पैसिफिक रणनीति में भारत की केंद्रीयता कम होती दिखाई देती है, तो यह भारत के लिए चेतावनी भी है कि महाशक्तियों की राजनीति में स्थायी स्थान किसी को नहीं मिलता।
भारत के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यही है—क्या वह पश्चिम और पूर्व, अमेरिका और रूस, सहयोग और स्वायत्तता के बीच संतुलन बनाए रख पाएगा?
यदि वह यह संतुलन साध लेता है, तो जी-7 की मेज पर उसकी उपस्थिति केवल प्रतीक नहीं, बल्कि 21वीं सदी की नई विश्व व्यवस्था के निर्माण में उसकी निर्णायक भूमिका का संकेत होगी।










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