ऑपरेशन सिंदूर 2.0 का डर !
सिंगापुर में आयोजित शांगरी-ला डायलॉग सम्मेलन के मंच से पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों द्वारा भारत के साथ संवाद बहाल करने की अपील केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं है। यह उस मनोवैज्ञानिक दबाव और रणनीतिक असुरक्षा का भी संकेत है जो पिछले वर्ष के ऑपरेशन सिंदूर और उसके बाद भारत की बदली हुई नीति ने पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान पर छोड़ा है।
वर्षों तक पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के विरुद्ध आरोपों की राजनीति करता रहा। लेकिन अब परिस्थितियां बदलती दिखाई दे रही हैं। जिस पाकिस्तान ने दशकों तक "वार्ता और आतंक" की दोहरी नीति अपनाई, वही आज दुनिया से भारत के साथ बातचीत शुरू कराने की गुहार लगा रहा है।
आखिर पाकिस्तान इतना चिंतित क्यों है?
पाकिस्तानी सेना के लेफ्टिनेंट जनरल नौमान जकारिया ने भारत के सैन्यीकरण, आक्रामक बयानबाजी और संकट प्रबंधन तंत्र की कमी को क्षेत्रीय अस्थिरता का कारण बताया। लेकिन उनके बयान की असली पंक्तियां वे नहीं हैं जो उन्होंने कही हैं, बल्कि वे हैं जो उन्होंने नहीं कही हैं।
उन्होंने यह नहीं बताया कि पाकिस्तान को अचानक संवाद की इतनी आवश्यकता क्यों महसूस होने लगी है।
इसके पीछे कई कारण हैं।
पहला, भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी सुरक्षा नीति में निर्णायक बदलाव किया है। उरी के बाद सर्जिकल स्ट्राइक, पुलवामा के बाद बालाकोट और फिर ऑपरेशन सिंदूर ने यह संदेश दिया कि नई दिल्ली अब केवल विरोध दर्ज कराने तक सीमित नहीं रहेगी।
दूसरा, सिंधु जल संधि का निलंबन पाकिस्तान के लिए केवल कूटनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक और कृषि सुरक्षा का प्रश्न बन चुका है।
तीसरा, पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति उसे लंबे सैन्य तनाव का जोखिम उठाने की अनुमति नहीं देती।
क्या पाकिस्तान को ऑपरेशन सिंदूर 2.0 का डर है?
आधिकारिक रूप से कोई भी पाकिस्तानी अधिकारी यह स्वीकार नहीं करेगा, लेकिन उनके बयानों से यह संकेत अवश्य मिलता है कि भारत की संभावित भविष्य की कार्रवाई को लेकर चिंता मौजूद है।
यदि पाकिस्तान वास्तव में मानता कि भारत किसी बड़े कदम की तैयारी नहीं कर रहा, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बार-बार संवाद की आवश्यकता और संकट प्रबंधन की बात उठाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
वास्तव में यह एक प्रकार का पूर्व-निवारक कूटनीतिक अभियान भी हो सकता है, जिसमें पाकिस्तान वैश्विक समुदाय को यह संदेश देना चाहता है कि दक्षिण एशिया में तनाव के लिए भारत जिम्मेदार है।
बदलता शक्ति संतुलन
दक्षिण एशिया का सामरिक संतुलन पिछले दो दशकों में तेजी से बदला है।
भारत—
विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुका है।
रक्षा आधुनिकीकरण पर तेजी से काम कर रहा है।
अंतरिक्ष, साइबर और मिसाइल क्षमताओं में विस्तार कर रहा है।
वैश्विक मंचों पर प्रभाव बढ़ा रहा है।
दूसरी ओर पाकिस्तान आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है।
यही असंतुलन आज उसकी रणनीतिक चिंता का बड़ा कारण है।
संवाद की राजनीति या समय खरीदने की कोशिश?
पाकिस्तान का संवाद आग्रह शांति की वास्तविक इच्छा भी हो सकता है और समय खरीदने की रणनीति भी।
इतिहास बताता है कि कई बार इस्लामाबाद ने अंतरराष्ट्रीय दबाव कम करने और आंतरिक चुनौतियों से निपटने के लिए संवाद का सहारा लिया है।
इसलिए भारत के नीति निर्माताओं के सामने चुनौती केवल वार्ता करने या न करने की नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि संवाद परिणामोन्मुख हो, केवल प्रक्रिया न बन जाए।
भारत की नई नीति
नई दिल्ली का रुख अब स्पष्ट दिखाई देता है।
भारत बातचीत का विरोध नहीं करता, लेकिन वह आतंकवाद और वार्ता को एक साथ चलाने के पक्ष में भी नहीं है।
यही कारण है कि भारत की प्राथमिकता अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नैरेटिव बनाने के बजाय जमीनी सुरक्षा हितों को सुरक्षित करना है।
निष्कर्ष
शांगरी-ला डायलॉग में पाकिस्तान की संवाद पुकार को केवल शांति पहल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह उस बदलती रणनीतिक वास्तविकता का प्रतिबिंब भी है जिसमें भारत पहले की तुलना में अधिक आत्मविश्वासी और निर्णायक दिखाई देता है।
संभव है कि पाकिस्तान वास्तव में क्षेत्रीय स्थिरता चाहता हो। यह भी संभव है कि वह बढ़ते दबाव को कम करने के लिए संवाद की ढाल खोज रहा हो। लेकिन एक तथ्य स्पष्ट है—दक्षिण एशिया की राजनीति में शक्ति संतुलन बदल चुका है।
और शायद यही कारण है कि आज इस्लामाबाद की भाषा में पहले की तुलना में अधिक आग्रह, अधिक सावधानी और कहीं अधिक बेचैनी दिखाई देती है।










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