संप्रदायवाद की नींव और 'अस्थिरता' का बाज़ार: पाकिस्तान की रणनीतिक प्रासंगिकता का संपूर्ण विश्लेषण

 

## प्रस्तावना: एक राष्ट्र की अनूठी परिभाषा

आधुनिक विश्व राजनीति में अधिकांश देशों का मूल्यांकन उनके 'सफल' या 'विफल' होने के पैमानों पर किया जाता है। लेकिन दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक मानचित्र पर स्थित पाकिस्तान एक ऐसा अपवाद है जिसे इन साधारण पैमानों से नहीं समझा जा सकता। पाकिस्तान के अस्तित्व को समझने के लिए हमें 'पतन' या 'विफलता' जैसे शब्दों से परे हटकर एक नई शब्दावली—**'रणनीतिक प्रासंगिकता' (Strategic Relevance)**—की ओर देखना होगा। पाकिस्तान न तो अभी पूरी तरह विफल हुआ है और न ही वह एक स्थिर राष्ट्र के रूप में स्थापित है। वह एक ऐसी स्थिति में फंसा है जहाँ उसने 'अस्थिरता' को ही अपनी प्रासंगिकता का आधार बना लिया है। 1947 में एक 'संप्रदायिक कुनबे' के रूप में अपनी नींव रखने वाला यह देश, आज भी उसी कट्टरता और अस्थिरता के 'व्यापार' के माध्यम से वैश्विक पटल पर खुद को जीवित रखे हुए है।

## 1. संप्रदायवाद: प्रासंगिकता बनाए रखने का वैचारिक ढांचा

पाकिस्तान का निर्माण 'दो-राष्ट्र सिद्धांत' के नाम पर हुआ था, जिसने धर्म को एक राष्ट्र का आधार बनाया। संप्रदायवाद, जो कभी एक आंदोलन था, धीरे-धीरे पाकिस्तान की सत्ता का प्राथमिक उपकरण बन गया।

### पहचान का निरंतर संकट

एक संप्रदायिक कुनबे में 'प्रासंगिकता' इस बात से तय नहीं होती कि राष्ट्र ने कितनी प्रगति की है, बल्कि इस बात से तय होती है कि वह राष्ट्र अपने 'धार्मिक मूल्यों' के प्रति कितना कट्टर है। यह 'शुद्धता की दौड़' (Race for Purity) ही समाज को अंदर से खोखला करती है। जब देश की पूरी ऊर्जा केवल यह साबित करने में लग जाए कि 'कौन सा संप्रदाय अधिक सच्चा है', तो वहां न तो विज्ञान पनप सकता है और न ही तर्क। यही वह वैचारिक व्यस्तता है जो पाकिस्तान की सत्ता को जनता के वास्तविक सवालों से बचाए रखती है।

### विविधता का दमन और राष्ट्रीय एकता का भ्रम

पाकिस्तान एक बहु-जातीय देश है, जहाँ पंजाबी, पश्तून, बलूच और सिंधी समुदायों का अपना अलग इतिहास और संस्कृति रही है। एक संप्रदायिक राज्य को विविधता से डर लगता है क्योंकि विविधता 'लोकतांत्रिक संवाद' की मांग करती है। पाकिस्तान ने इन विविधताओं को एक 'संप्रदायिक चादर' में लपेटकर रखने का प्रयास किया है, ताकि उनकी अपनी विशिष्ट प्रासंगिकता बनी रहे। जब भी ये समूह अपने अधिकारों की बात करते हैं, तो राज्य उन्हें 'इस्लामी एकता' के विरुद्ध बताकर दमन करता है। यह संप्रदायवाद की वह जकड़ है जिसने पाकिस्तान को कभी एक स्थिर राष्ट्र नहीं बनने दिया।

## 2. अस्थिरता: एक 'रणनीतिक कमोडिटी' (Strategic Commodity)

अक्सर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्थिरता को राष्ट्रों की शक्ति का पर्याय माना जाता है। लेकिन पाकिस्तान ने इस सिद्धांत को उलट दिया है। पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था ने 'अस्थिरता' को एक 'कमोडिटी' की तरह विकसित किया है।

### प्रासंगिकता का वैश्विक मॉडल

यदि पाकिस्तान स्थिर, समृद्ध और शांत होता, तो दुनिया के लिए उसकी 'महत्ता' केवल एक दक्षिण एशियाई देश की होती। लेकिन 'अस्थिरता' के कारण, वह महाशक्तियों के लिए एक 'रणनीतिक चिंता' बन गया है।

 * **चीन के लिए:** CPEC केवल एक आर्थिक परियोजना नहीं, बल्कि पाकिस्तान की अस्थिरता के कारण चीन की एक 'रणनीतिक जकड़' बन गई है। चीन जानता है कि यदि वह पाकिस्तान को छोड़ता है, तो वहां की अस्थिरता उसके अपने शिनजियांग प्रांत को प्रभावित कर सकती है।

 * **अमेरिका के लिए:** अमेरिका पाकिस्तान को एक ऐसे देश के रूप में देखता है जो 'अस्थिर' रहकर भी 'उपयोगी' है। यह अस्थिरता ही उसे अमेरिका के लिए एक 'उपयोगी सिरदर्द' बनाए रखती है, जिसके कारण उसे समय-समय पर आर्थिक मदद मिलती रहती है।

अस्थिरता ने पाकिस्तान को वैश्विक शतरंज का एक ऐसा मोहरा बना दिया है जिसे हटाया नहीं जा सकता, क्योंकि वह 'अस्थिर' रहकर ही अपनी जगह बनाए रखता है।

## 3. सैन्य नेतृत्व: 'अस्थिरता-प्रासंगिकता' का रक्षक

पाकिस्तान की सेना की प्रासंगिकता देश के 'विकास' में नहीं, बल्कि देश को 'विस्फोट' से बचाने के 'दिखावे' में है।

### भय का निरंतर विपणन

अस्थिरता के कारण हमेशा 'बाहरी' या 'आंतरिक' दुश्मन का डर बना रहता है। इस डर के नाम पर सेना देश का बजट हड़पती है और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर रखती है। सेना के लिए यह एक 'ऑक्सीजन' की तरह है। यदि देश स्थिर होगा, तो सेना के पास नागरिकों के निजी मामलों, न्यायपालिका और अर्थव्यवस्था में हस्तक्षेप करने का कोई नैतिक आधार नहीं बचेगा। अतः, सेना के लिए अस्थिरता को बनाए रखना ही उसकी अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखना है।

## 4. वैश्विक कूटनीति: प्रासंगिकता का छलावा

पाकिस्तान की वैश्विक कूटनीति का उद्देश्य 'सभ्य राष्ट्र' बनने का नहीं, बल्कि 'अपरिहार्य' (Indispensable) बने रहने का है।

### परमाणु हथियार और 'ब्लैकमेलिंग' की राजनीति

पाकिस्तान की सबसे बड़ी वैश्विक प्रासंगिकता उसके परमाणु हथियार हैं। दुनिया उसे इसलिए नहीं मानती कि वह एक सफल राष्ट्र है, बल्कि इसलिए कि वह 'अस्थिर' है और उसके पास परमाणु बम हैं। यह डर उसकी प्रासंगिकता का सबसे बड़ा आधार है। दुनिया को यह डर रहता है कि "अगर पाकिस्तान पूरी तरह ढह गया, तो ये परमाणु हथियार किसके हाथ लगेंगे?" यह 'परमाणु ब्लैकमेलिंग' पाकिस्तान की वैश्विक प्रासंगिकता का सबसे गहरा और खतरनाक हिस्सा है।

### आतंकवाद का दोहरा खेल

आतंकवाद के प्रति पाकिस्तान का रुख भी इसी प्रासंगिकता को बनाए रखने का हिस्सा है। वह दुनिया को बताता है कि "मैं आतंकवाद का समाधान भी हूं और समस्या भी।" इस दोहरे चरित्र ने उसे वैश्विक मंचों पर एक ऐसी प्रासंगिकता दी है जहाँ लोग उसे इग्नोर नहीं कर पाते। उसे अपनी अस्थिरता और आतंकवाद की समस्या के बदले में 'कर्ज' और 'सुरक्षा कवर' मिलता रहता है।

## 5. क्या प्रासंगिकता का यह रास्ता स्थायी है?

पाकिस्तान जिस 'संप्रदायिक अस्थिरता' की प्रासंगिकता पर सवार है, वह अब अपनी उम्र पूरी कर रही है।

### जनता का मोहभंग

जब प्रासंगिकता का पूरा आधार 'भय' और 'नफरत' हो, तो एक समय बाद जनता का उससे भरोसा उठना तय है। पीओके और बलूचिस्तान में दिख रहा आक्रोश इस बात का प्रमाण है कि 'संप्रदायिक कुनबे' की यह प्रासंगिकता अब वहां के लोगों के लिए अप्रासंगिक हो चुकी है। लोग अब रोटी और शिक्षा मांग रहे हैं, न कि संप्रदायिक कट्टरता का 'सुरक्षा कवच'।

### विकास बनाम अस्थिरता की दौड़

आज की दुनिया 'सप्लाई चेन', 'तकनीकी नवाचार' और 'आर्थिक स्थिरता' में निवेश कर रही है। भारत जैसे देशों की प्रासंगिकता उनकी 'विकास गाथा' से है, जबकि पाकिस्तान की प्रासंगिकता उसके 'खतरे' से। भविष्य उन देशों का है जो दुनिया को शांति और स्थिरता प्रदान करते हैं। पाकिस्तान इस दौड़ से बाहर होता जा रहा है।

## निष्कर्ष

पाकिस्तान की त्रासदी यह है कि उसने **'स्थिर राष्ट्र'** बनने के बजाय **'प्रासंगिक मोहरा'** बने रहना चुना। संप्रदायवाद ने उसे एक झुंड (कुनबा) बनाया और अस्थिरता ने उसे उस झुंड का 'अपरिहार्य रक्षक' होने का भ्रम दिया।

पाकिस्तान की प्रासंगिकता का यह सफर अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। दुनिया अब ऐसे देशों को प्रासंगिक मानती है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था में मूल्य जोड़ते हैं। पाकिस्तान के लिए भविष्य का रास्ता इस 'अस्थिर प्रासंगिकता' को छोड़कर 'स्थिर नागरिकता' के निर्माण से होकर जाता है। यदि वह अपनी संप्रदायिक पहचान और अस्थिरता की लत से बाहर नहीं निकल सका, तो उसकी यह 'प्रासंगिकता' अंततः इतिहास की एक ऐसी विसंगति बनकर रह जाएगी, जिसका कोई भविष्य नहीं होगा। पाकिस्तान को अब तय करना है—क्या वह दुनिया के लिए एक 'रणनीतिक सिरदर्द' बना रहना चाहता है, या एक ऐसा राष्ट्र जो अपनी स्थिरता और शांति से वैश्विक पटल पर अपनी जगह बनाए। यदि उसने समय रहते अपनी नींव को नहीं बदला, तो यह संप्रदायिक कुनबा अपनी ही कट्टरता की अग्नि में भस्म होने के लिए अभिशप्त है।

*यह विश्लेषण पाकिस्तान के संकट को एक गहरे रणनीतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से देखता है। क्या आप इस लेख के किसी विशिष्ट खंड पर और अधिक डेटा या ऐतिहासिक उदाहरणों की अपेक्षा रखते हैं?*


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