सोशल मीडिया का प्रदर्शनवाद और रोजगार का संकट: क्या हम वास्तविक मुद्दों से भटक रहे हैं?

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में भारत सहित पूरी दुनिया ने दो बड़ी सामाजिक घटनाओं को बहुत तेजी से उभरते देखा है। पहली, सोशल मीडिया का अभूतपूर्व विस्तार; और दूसरी, रोजगार के स्वरूप में आया परिवर्तन। इन दोनों ने समाज, राजनीति, संस्कृति और अर्थव्यवस्था को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है। एक ओर सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नया आयाम दिया, वहीं दूसरी ओर उसने लोकप्रियता, प्रदर्शन और त्वरित प्रसिद्धि की ऐसी संस्कृति को जन्म दिया जिसमें गंभीर वैचारिक विमर्श पीछे छूटता दिखाई देता है। इसी प्रकार रोजगार के क्षेत्र में भी ऐसे कार्यों को अत्यधिक प्रचार मिला है जो कभी पूरक आय के साधन माने जाते थे, जबकि उद्योग, विज्ञान, अनुसंधान और उत्पादन आधारित रोजगार अपेक्षाकृत कम चर्चा में दिखाई देते हैं। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या समाज वास्तविक मुद्दों से हटकर प्रदर्शन और तात्कालिक प्रसिद्धि की ओर बढ़ रहा है? क्या सोशल मीडिया ने जनचर्चा की गुणवत्ता को प्रभावित किया है? और क्या रोजगार के बारे में हमारी सामूहिक सोच में भी बदलाव आया है? सोशल मीडिया का मूल उद्देश्य जब सोशल मीडिया मंचों का उदय हुआ, तब उनका उद्देश्य लोगों को जोड़ना, विचारों का आदान-प्रदान करना और सूचना के लोकतंत्रीकरण को बढ़ावा देना था। आज दुनिया भर में अरबों लोग सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं। भारत में भी करोड़ों नागरिक विभिन्न मंचों के माध्यम से समाचार प्राप्त करते हैं, विचार व्यक्त करते हैं और सामाजिक संवाद का हिस्सा बनते हैं। प्रारंभिक वर्षों में सोशल मीडिया ने कई सकारात्मक परिवर्तन किए। सामाजिक आंदोलनों को बल मिला, शिक्षा और ज्ञान का प्रसार हुआ, छोटे उद्यमियों को ग्राहकों तक पहुँचने का अवसर मिला और आम नागरिकों को अपनी बात रखने का मंच मिला। लेकिन समय के साथ इसकी प्रकृति में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले। वैचारिक विमर्श से प्रदर्शन संस्कृति तक आज सोशल मीडिया का एक बड़ा हिस्सा विचारों की गंभीर बहस की अपेक्षा दृश्य आकर्षण और त्वरित मनोरंजन पर आधारित दिखाई देता है। एल्गोरिदम उन सामग्रियों को अधिक बढ़ावा देते हैं जो लोगों का ध्यान अधिक समय तक रोक सकें। इस कारण अनेक रचनाकार ज्ञानवर्धक या विश्लेषणात्मक सामग्री की बजाय ऐसी सामग्री बनाने लगे जो अधिक क्लिक, लाइक और शेयर प्राप्त कर सके। परिणामस्वरूप— सार्वजनिक विमर्श का स्तर प्रभावित हुआ। जटिल विषयों को अत्यधिक सरलीकृत किया जाने लगा। तथ्य की अपेक्षा सनसनी को महत्व मिलने लगा। निजी जीवन का प्रदर्शन सामाजिक प्रतिष्ठा का साधन बन गया। आज अनेक लोग अपने निजी जीवन के अत्यंत व्यक्तिगत क्षणों को भी सार्वजनिक मंचों पर साझा करते हैं। भोजन से लेकर पारिवारिक विवाद, विवाह से लेकर वैवाहिक जीवन तक, सब कुछ सामग्री (कंटेंट) में बदलता जा रहा है। निजता का क्षरण किसी भी सभ्य समाज में निजता का विशेष महत्व होता है। घर, परिवार और व्यक्तिगत संबंध व्यक्ति के निजी क्षेत्र का हिस्सा माने जाते हैं। किंतु सोशल मीडिया ने इस सीमा को धुंधला कर दिया है। अब लोगों का एक वर्ग अपने जीवन के हर पहलू को सार्वजनिक करने लगा है। कई बार यह प्रक्रिया स्वैच्छिक होती है, जबकि कई बार सामाजिक दबाव और लोकप्रियता की चाह से प्रेरित होती है। इस प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप— निजी जीवन का व्यवसायीकरण होने लगा। पारिवारिक संबंध भी दर्शकों के लिए सामग्री बन गए। मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। तुलना और प्रतिस्पर्धा की भावना बढ़ी। महिलाओं की प्रस्तुति और बाज़ार की भूमिका सोशल मीडिया की आलोचना करने वाले अनेक लोग यह तर्क देते हैं कि कई मंचों पर महिलाओं के शरीर और सौंदर्य को अत्यधिक वस्तु की तरह प्रस्तुत किया जाता है। यह विषय अत्यंत संवेदनशील है। किसी भी व्यक्ति को अपनी अभिव्यक्ति का अधिकार है, किंतु यह भी सत्य है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था में आकर्षण और दृश्यता को आर्थिक मूल्य में परिवर्तित करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इसका परिणाम यह हुआ कि कई बार सामग्री की गुणवत्ता से अधिक महत्व उसके दृश्य प्रभाव को मिलने लगा। यह समस्या केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है। पुरुष भी अब शरीर, फैशन और प्रदर्शन आधारित सामग्री के माध्यम से लोकप्रियता अर्जित करने का प्रयास करते हैं। इसलिए इसे व्यापक प्रदर्शनवादी संस्कृति के रूप में समझना अधिक उचित होगा। "रील अर्थव्यवस्था" का उदय पिछले कुछ वर्षों में लघु वीडियो मंचों ने अभूतपूर्व लोकप्रियता प्राप्त की है। अब लाखों युवा कंटेंट क्रिएटर बनने का सपना देखते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि डिजिटल सामग्री निर्माण एक वास्तविक आर्थिक गतिविधि है। अनेक लोगों ने इससे सफल व्यवसाय खड़े किए हैं। लेकिन प्रश्न तब उठता है जब इसे व्यापक रोजगार संकट के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगे। हर सफल डिजिटल रचनाकार के पीछे लाखों ऐसे लोग भी हैं जिन्हें कोई आर्थिक लाभ नहीं मिलता। सफलता अत्यधिक असमान रूप से वितरित होती है। यानी कुछ लोग बहुत अधिक कमाते हैं, जबकि अधिकांश लोग सीमित या शून्य आय प्राप्त करते हैं। पकौड़े और रोजगार की बहस भारत में "पकौड़ा रोजगार" शब्द एक राजनीतिक और आर्थिक बहस का विषय बन चुका है। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि कोई भी ईमानदार कार्य छोटा नहीं होता। सड़क किनारे भोजन बेचना, चाय की दुकान चलाना या पकौड़े तलना सम्मानजनक श्रम है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब ऐसे कार्यों को व्यापक आर्थिक विकास और रोजगार नीति का पर्याप्त विकल्प माना जाए। एक आधुनिक अर्थव्यवस्था को आवश्यकता होती है— विनिर्माण उद्योग की अनुसंधान एवं विकास की विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की स्वास्थ्य सेवाओं की शिक्षा क्षेत्र की इंजीनियरिंग और तकनीकी रोजगारों की यदि उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप अवसर नहीं मिलते, तो यह आर्थिक संरचना की चुनौती को दर्शाता है। उत्पादक और उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था अर्थशास्त्री लंबे समय से यह बताते रहे हैं कि किसी देश की समृद्धि मुख्यतः उसकी उत्पादक क्षमता पर निर्भर करती है। जो देश— वस्तुओं का निर्माण करते हैं, तकनीक विकसित करते हैं, शोध में निवेश करते हैं, नवाचार को प्रोत्साहित करते हैं, वे दीर्घकालिक आर्थिक शक्ति प्राप्त करते हैं। इसके विपरीत यदि अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा केवल उपभोग और मनोरंजन पर आधारित हो जाए, तो विकास की गति सीमित हो सकती है। युवाओं की आकांक्षाओं में परिवर्तन सोशल मीडिया ने युवाओं के सामने सफलता की नई परिभाषाएँ प्रस्तुत की हैं। पहले सफलता का संबंध शिक्षा, ज्ञान, कौशल और पेशेवर उपलब्धियों से जोड़ा जाता था। अब अनेक युवाओं के लिए सफलता का अर्थ हो गया है— अधिक फॉलोअर्स, वायरल वीडियो, त्वरित प्रसिद्धि, ब्रांड सहयोग। हालाँकि इसमें गलत कुछ नहीं है, लेकिन जब यह एकमात्र लक्ष्य बन जाए, तब समस्या उत्पन्न हो सकती है। एल्गोरिदम की भूमिका सोशल मीडिया मंच तटस्थ नहीं होते। वे एल्गोरिदम के माध्यम से तय करते हैं कि कौन-सी सामग्री अधिक लोगों तक पहुँचेगी। सामान्यतः वे सामग्री अधिक फैलती है जो— भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करे, विवाद पैदा करे, मनोरंजक हो, दृश्य रूप से आकर्षक हो। इस कारण गंभीर विश्लेषण, शोध आधारित लेखन और जटिल विषय अक्सर कम दृश्यता प्राप्त करते हैं। समाज पर दीर्घकालिक प्रभाव यदि समाज लगातार प्रदर्शन और मनोरंजन प्रधान संस्कृति की ओर बढ़ता है, तो उसके कई प्रभाव हो सकते हैं— 1. ध्यान अवधि में कमी लंबे लेख और गंभीर अध्ययन कम लोकप्रिय होने लगते हैं। 2. सतही ज्ञान लोग जटिल विषयों को कुछ सेकंड की क्लिप के आधार पर समझने लगते हैं। 3. लोकतांत्रिक विमर्श पर प्रभाव गंभीर नीति चर्चाओं की जगह भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ ले सकती हैं। 4. रोजगार संबंधी भ्रम युवाओं को यह लग सकता है कि लोकप्रियता ही आर्थिक सफलता का सबसे आसान मार्ग है। क्या सोशल मीडिया पूरी तरह नकारात्मक है? नहीं। सोशल मीडिया के अनेक सकारात्मक पक्ष भी हैं। ऑनलाइन शिक्षा का प्रसार छोटे व्यवसायों का प्रचार आपदा प्रबंधन में सहायता सामाजिक जागरूकता साहित्य और कला का प्रसार नागरिक पत्रकारिता समस्या माध्यम में नहीं, बल्कि उसके उपयोग और प्रोत्साहन संरचना में है। आगे का रास्ता समाधान सोशल मीडिया का विरोध नहीं, बल्कि उसका संतुलित उपयोग है। शिक्षा में सुधार डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा दिया जाए। कौशल विकास युवाओं को आधुनिक तकनीकी और व्यावसायिक कौशल प्रदान किए जाएँ। अनुसंधान और नवाचार विज्ञान और तकनीक में निवेश बढ़ाया जाए। गुणवत्तापूर्ण रोजगार उद्योग और विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहन दिया जाए। जिम्मेदार सोशल मीडिया उपयोग निजता, तथ्यपरकता और सामाजिक मर्यादा का सम्मान किया जाए। निष्कर्ष सोशल मीडिया और डिजिटल अर्थव्यवस्था आधुनिक युग की वास्तविकताएँ हैं। इन्हें न तो पूरी तरह अस्वीकार किया जा सकता है और न ही इनके प्रभावों की अनदेखी की जा सकती है। चिंता का विषय तब बनता है जब वैचारिक बहसों, ज्ञान, विज्ञान और उत्पादक गतिविधियों की अपेक्षा प्रदर्शन, सनसनी और तात्कालिक प्रसिद्धि को अधिक महत्व मिलने लगे। इसी प्रकार पकौड़े बेचना या रील बनाना अपने-आप में कोई बुरा या छोटा कार्य नहीं है। समस्या तब है जब इन्हें व्यापक रोजगार नीति, आर्थिक विकास और युवाओं की आकांक्षाओं का पर्याप्त विकल्प मान लिया जाए। किसी राष्ट्र की दीर्घकालिक समृद्धि केवल लोकप्रियता से नहीं, बल्कि शिक्षा, कौशल, विज्ञान, उत्पादन, नवाचार और सृजनात्मक श्रम से निर्मित होती है। एक स्वस्थ समाज वही होगा जहाँ सोशल मीडिया संवाद का माध्यम बने, प्रदर्शन का नहीं; और जहाँ रोजगार का अर्थ केवल जीविका नहीं, बल्कि उत्पादकता, गरिमा और राष्ट्र निर्माण में सार्थक योगदान भी हो।

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