पाकिस्तान : अमेरिका की साझेदारी, अफगानिस्तान की त्रासदी और चीन पर निर्भरता
दक्षिण एशिया का इतिहास इस बात का साक्षी है कि भूगोल किसी भी राष्ट्र की नियति को गहराई से प्रभावित करता है। पाकिस्तान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 1947 में भारत के विभाजन से बने इस राष्ट्र ने अपनी स्थापना के साथ ही स्वयं को एक ऐसे क्षेत्र में पाया जहाँ महाशक्तियों के हित, धार्मिक राजनीति, सामरिक प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय संघर्ष लगातार टकराते रहे हैं।
पिछले सात दशकों में पाकिस्तान ने स्वयं को अनेक बार विश्व राजनीति के केंद्र में पाया। कभी वह अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी गुट का महत्वपूर्ण सहयोगी बना, कभी सोवियत संघ के विरुद्ध लड़ाई का अग्रिम मोर्चा, कभी आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध का साझेदार और आज चीन की क्षेत्रीय रणनीति का प्रमुख स्तंभ। लेकिन प्रश्न यह है कि इन सभी रणनीतिक साझेदारियों से पाकिस्तान को वास्तव में क्या प्राप्त हुआ?
यदि इतिहास पर दृष्टि डालें तो दिखाई देता है कि पाकिस्तान ने अनेक बार महाशक्तियों की नीतियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, किन्तु उसके परिणामस्वरूप उसे स्थायी आर्थिक विकास, राजनीतिक स्थिरता और सामाजिक शांति प्राप्त नहीं हो सकी। विशेष रूप से अफगानिस्तान और अमेरिका के साथ उसके संबंध इस विडंबना को स्पष्ट करते हैं।
पाकिस्तान का जन्म और सुरक्षा की मानसिकता
पाकिस्तान का जन्म ही सुरक्षा संबंधी चिंताओं के साथ हुआ था। उसके राजनीतिक नेतृत्व को प्रारम्भ से यह भय था कि भारत के साथ शक्ति संतुलन बनाए रखना कठिन होगा।
इसी कारण पाकिस्तान ने अपने आरंभिक वर्षों में विकास की अपेक्षा सुरक्षा और सैन्य शक्ति को अधिक प्राथमिकता दी। सेना धीरे-धीरे केवल रक्षा संस्था न रहकर राष्ट्रीय राजनीति और विदेश नीति की निर्णायक शक्ति बन गई।
भारत के साथ प्रतिस्पर्धा पाकिस्तान की राष्ट्रीय पहचान का एक महत्वपूर्ण तत्व बनती गई। परिणामस्वरूप उसकी विदेश नीति का अधिकांश भाग भारत-केंद्रित होता चला गया।
शीत युद्ध और अमेरिका का सहयोगी पाकिस्तान
1950 के दशक में जब विश्व अमेरिका और सोवियत संघ के दो ध्रुवों में बंट रहा था, पाकिस्तान ने स्पष्ट रूप से अमेरिकी गुट का चयन किया।
वह SEATO और CENTO जैसे सैन्य गठबंधनों का सदस्य बना। बदले में उसे अमेरिकी सैन्य सहायता, आर्थिक सहयोग और राजनीतिक समर्थन प्राप्त हुआ।
उस समय पाकिस्तान के नीति निर्माताओं को विश्वास था कि अमेरिका के साथ निकटता भारत के विरुद्ध उसकी सामरिक स्थिति को मजबूत करेगी।
लेकिन यह संबंध समान साझेदारी का नहीं था। अमेरिका पाकिस्तान को मुख्यतः सोवियत प्रभाव को रोकने के साधन के रूप में देखता था।
जैसे ही अमेरिकी प्राथमिकताएँ बदलतीं, पाकिस्तान का महत्व भी कम हो जाता।
अफगानिस्तान : शीत युद्ध का युद्धक्षेत्र
1979 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में प्रवेश किया। यह घटना शीत युद्ध का एक निर्णायक मोड़ थी।
अमेरिका ने इसे सोवियत विस्तारवाद के रूप में देखा और उसके विरुद्ध व्यापक अभियान शुरू किया। इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण आधार पाकिस्तान बना।
अरबों डॉलर की आर्थिक और सैन्य सहायता पाकिस्तान पहुँची। लाखों अफगान शरणार्थी पाकिस्तान में आए। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI इस पूरे अभियान का प्रमुख माध्यम बनी।
उस समय पाकिस्तान को लगा कि वह क्षेत्रीय राजनीति का केंद्र बन गया है। अमेरिका, सऊदी अरब और पश्चिमी देशों का समर्थन उसके साथ था।
लेकिन इस रणनीति के दूरगामी परिणामों का पर्याप्त आकलन नहीं किया गया।
जिहाद की राजनीति और उसके दुष्परिणाम
सोवियत विरोधी युद्ध के दौरान धार्मिक उग्रवाद को एक राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग किया गया।
मदरसे, प्रशिक्षण शिविर और सशस्त्र समूह बड़ी संख्या में विकसित हुए। इन्हें तत्कालीन परिस्थितियों में उपयोगी समझा गया।
सोवियत सेना की वापसी के बाद यह पूरा ढाँचा समाप्त नहीं हुआ। इसके विपरीत यह विभिन्न रूपों में फैलता गया।
यहीं से पाकिस्तान के लिए वह संकट शुरू हुआ जिसका प्रभाव आज तक दिखाई देता है।
जो संगठन कभी रणनीतिक संपत्ति समझे जाते थे, उनमें से अनेक बाद में सुरक्षा चुनौती बन गए।
तालिबान का उदय
1990 के दशक में अफगानिस्तान गृहयुद्ध की आग में जल रहा था।
इसी दौरान तालिबान का उदय हुआ। पाकिस्तान ने इसे अफगानिस्तान में स्थिरता स्थापित करने और भारत के प्रभाव को सीमित करने के अवसर के रूप में देखा।
1996 में तालिबान ने काबुल पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।
कई विश्लेषकों ने इसे पाकिस्तान की रणनीतिक सफलता माना। ऐसा प्रतीत हुआ कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान के अनुकूल शासन स्थापित हो गया है।
लेकिन यह सफलता अस्थायी सिद्ध हुई।
11 सितम्बर और बदलती परिस्थितियाँ
11 सितम्बर 2001 के आतंकवादी हमलों ने विश्व राजनीति को बदल दिया।
अमेरिका ने अफगानिस्तान में सैन्य अभियान शुरू किया और पाकिस्तान को अपने साथ आने के लिए कहा।
पाकिस्तान के सामने कठिन विकल्प था।
एक ओर तालिबान से पुराने संबंध थे, दूसरी ओर अमेरिका का दबाव।
अंततः पाकिस्तान ने अमेरिका का साथ चुना।
इसके बाद वह "आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध" का प्रमुख सहयोगी बन गया।
अरबों डॉलर की सहायता, लेकिन क्या विकास?
2001 से 2021 तक पाकिस्तान को अमेरिका से भारी आर्थिक और सैन्य सहायता प्राप्त हुई।
किन्तु प्रश्न यह है कि क्या यह सहायता दीर्घकालिक विकास में परिवर्तित हुई?
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लगातार संकटों से जूझती रही।
ऊर्जा संकट, विदेशी ऋण, राजनीतिक अस्थिरता और कमजोर औद्योगिक विकास उसकी प्रमुख समस्याएँ बनी रहीं।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सहायता पर निर्भरता ने आत्मनिर्भर आर्थिक संरचना विकसित करने की प्रक्रिया को कमजोर किया।
अफगानिस्तान में अमेरिका की वापसी और पाकिस्तान की अपेक्षाएँ
2021 में जब अमेरिका ने अफगानिस्तान से अपनी सेना वापस बुला ली और तालिबान ने पुनः सत्ता प्राप्त कर ली, तब पाकिस्तान में अनेक लोगों ने इसे अपनी रणनीतिक जीत माना।
ऐसा प्रतीत हुआ कि अब काबुल में एक मित्रवत सरकार होगी।
लेकिन घटनाएँ अपेक्षा के विपरीत हुईं।
तालिबान और पाकिस्तान के बीच बढ़ता तनाव
तालिबान सरकार ने पाकिस्तान की सभी अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया।
सबसे बड़ी समस्या टीटीपी (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) बनकर सामने आई।
यह संगठन पाकिस्तान के भीतर हमले करता रहा।
पाकिस्तान का आरोप रहा कि इसके लड़ाके अफगान सीमा क्षेत्रों में सुरक्षित ठिकाने बना रहे हैं।
तालिबान सरकार ने कई बार इन आरोपों को अस्वीकार किया।
परिणामस्वरूप दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता गया।
सीमा संघर्ष : मित्रता से टकराव तक
डूरंड रेखा का विवाद नया नहीं है।
अफगानिस्तान लंबे समय से इस सीमा को पूर्णतः स्वीकार नहीं करता।
तालिबान शासन के बाद यह विवाद और अधिक जटिल हो गया।
सीमा चौकियों पर झड़पें हुईं।
गोलीबारी और सैन्य तनाव की घटनाएँ सामने आईं।
जिस अफगानिस्तान को कभी रणनीतिक गहराई कहा जाता था, वही अब पाकिस्तान की सुरक्षा चुनौती बन गया।
अमेरिका से संबंध : उपयोगिता और सीमाएँ
पाकिस्तान और अमेरिका के संबंधों में हमेशा एक प्रकार की व्यावहारिकता रही है।
दोनों ने एक-दूसरे का उपयोग अपने-अपने हितों के लिए किया।
अमेरिका को क्षेत्रीय सहयोगी चाहिए था।
पाकिस्तान को आर्थिक सहायता और सामरिक समर्थन चाहिए था।
लेकिन यह संबंध कभी गहरे विश्वास पर आधारित नहीं हो पाया।
अमेरिकी प्रशासन अक्सर पाकिस्तान पर दोहरी नीति अपनाने के आरोप लगाता रहा।
दूसरी ओर पाकिस्तान मानता रहा कि अमेरिका ने उसे अपने हित पूरे होने के बाद अकेला छोड़ दिया।
चीन की ओर बढ़ता झुकाव
अमेरिका के साथ संबंधों में उतार-चढ़ाव के बीच चीन पाकिस्तान का सबसे स्थायी साझेदार बनकर उभरा।
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) इस साझेदारी का सबसे बड़ा प्रतीक है।
चीन ने अरबों डॉलर का निवेश किया।
बंदरगाह, सड़कें, ऊर्जा परियोजनाएँ और आधारभूत संरचना विकसित की गई।
लेकिन आलोचकों का कहना है कि इससे पाकिस्तान की ऋण निर्भरता भी बढ़ी।
क्या पाकिस्तान को रणनीतिक लाभ मिला?
यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
सत्तर वर्षों की विदेश नीति के बाद पाकिस्तान को क्या प्राप्त हुआ?
क्या वह आर्थिक महाशक्ति बन सका?
क्या वह राजनीतिक रूप से स्थिर हो सका?
क्या वह क्षेत्रीय नेतृत्व स्थापित कर पाया?
क्या उसकी सुरक्षा चुनौतियाँ समाप्त हुईं?
इन प्रश्नों के उत्तर मिश्रित दिखाई देते हैं।
भारत की तुलना में अलग मार्ग
भारत ने भी अनेक चुनौतियों का सामना किया।
लेकिन उसने अपेक्षाकृत स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने का प्रयास किया।
गुटनिरपेक्षता, आर्थिक सुधार, तकनीकी विकास और लोकतांत्रिक संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण पर बल दिया।
आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।
इसके विपरीत पाकिस्तान बार-बार आर्थिक सहायता पैकेजों, विदेशी ऋण और राजनीतिक संकटों से जूझता रहा।
भविष्य की राह
पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह सुरक्षा-केंद्रित सोच से आगे बढ़कर विकास-केंद्रित मॉडल अपनाए।
उसे—
शिक्षा में निवेश बढ़ाना होगा।
औद्योगिक विकास को प्राथमिकता देनी होगी।
पड़ोसियों के साथ स्थायी संबंध विकसित करने होंगे।
उग्रवाद और कट्टरवाद पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना होगा।
विदेश नीति को केवल सामरिक प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रखना होगा।
निष्कर्ष
पिछले सात दशकों का इतिहास बताता है कि पाकिस्तान ने अनेक बार महाशक्तियों की रणनीतियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सोवियत विरोधी युद्ध, आतंकवाद के विरुद्ध अभियान, अफगानिस्तान की राजनीति और चीन की क्षेत्रीय योजनाओं में उसकी उपस्थिति निर्णायक रही।
किन्तु विडंबना यह है कि इन साझेदारियों के बावजूद पाकिस्तान को वह स्थिरता और समृद्धि प्राप्त नहीं हुई जिसकी उसे अपेक्षा थी। जिस अफगानिस्तान को कभी रणनीतिक संपत्ति समझा गया, वही आज सीमा संघर्ष और सुरक्षा संकट का स्रोत बन गया है। जिस अमेरिका के साथ दशकों तक साझेदारी रही, वह संबंध भी स्थायी विश्वास में परिवर्तित नहीं हो पाया। और जिस चीन पर आज पाकिस्तान सबसे अधिक निर्भर है, वहाँ भी आर्थिक लाभ और ऋण निर्भरता के बीच संतुलन का प्रश्न बना हुआ है।
इतिहास का सबसे बड़ा सबक यही है कि कोई भी राष्ट्र केवल बाहरी शक्तियों के सहारे महान नहीं बनता। स्थायी शक्ति का स्रोत मजबूत अर्थव्यवस्था, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, वैज्ञानिक प्रगति, लोकतांत्रिक संस्थाएँ और राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता होती हैं। पाकिस्तान के सामने आज यही सबसे बड़ी चुनौती है—क्या वह भू-राजनीतिक मोहरे की भूमिका से आगे बढ़कर एक आत्मनिर्भर और स्थिर राष्ट्र बन पाएगा, या फिर महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा में उलझा रहेगा? यही प्रश्न उसके भविष्य का निर्धारण करेगा।










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