भारत, रूस और चीन के नेतृत्व में संगठित हो एशिया: क्या बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था ही वैश्विक शांति का मार्ग है?



विश्व राजनीति आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। पिछले तीन दशकों तक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अमेरिका का प्रभाव अत्यंत मजबूत रहा। लेकिन अब चीन के आर्थिक उभार, रूस की सामरिक सक्रियता, भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका तथा अन्य उभरती शक्तियों के कारण विश्व धीरे-धीरे बहुध्रुवीय (Multipolar) व्यवस्था की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है।
इसी संदर्भ में यह विचार सामने आता है कि क्या भारत, रूस और चीन के नेतृत्व में एशियाई देशों का व्यापक सहयोग विकसित होना चाहिए, ताकि वैश्विक शक्ति-संतुलन अधिक संतुलित और न्यायपूर्ण बन सके? यह विचार समर्थकों और आलोचकों—दोनों के बीच व्यापक बहस का विषय है।
एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था की चुनौती
शीत युद्ध समाप्त होने के बाद अमेरिका विश्व की प्रमुख महाशक्ति बनकर उभरा। इस अवधि में उसने अनेक क्षेत्रों में सैन्य हस्तक्षेप किए और वैश्विक संस्थाओं में भी उसका प्रभाव बढ़ा। समर्थकों का मत है कि इससे अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक व्यवस्था को मजबूती मिली, जबकि आलोचक मानते हैं कि कई हस्तक्षेपों ने क्षेत्रीय अस्थिरता भी पैदा की।
इसी पृष्ठभूमि में अनेक देश अधिक संतुलित वैश्विक व्यवस्था की आवश्यकता पर बल देते हैं।
एशिया क्यों महत्वपूर्ण है?
आज एशिया—
विश्व की लगभग 60 प्रतिशत जनसंख्या का घर है।
वैश्विक आर्थिक विकास का प्रमुख केंद्र बन चुका है।
ऊर्जा, तकनीक और व्यापार का सबसे तेज़ी से बढ़ता क्षेत्र है।
विश्व की कई परमाणु शक्तियाँ इसी महाद्वीप में स्थित हैं।
यदि एशियाई देशों के बीच सहयोग बढ़ता है, तो वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में उनकी भूमिका और प्रभाव भी बढ़ सकता है।
भारत की भूमिका
भारत आज विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। उसकी विदेश नीति की प्रमुख विशेषताएँ हैं—
रणनीतिक स्वायत्तता
सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संतुलित संबंध
वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज़ को मजबूत करना
शांतिपूर्ण समाधान और संवाद का समर्थन
भारत की नीति किसी सैन्य गुट का हिस्सा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार विभिन्न देशों के साथ सहयोग करने की रही है।
रूस का महत्व
रूस ऊर्जा, रक्षा और प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से विश्व की महत्वपूर्ण शक्ति है। भारत और रूस के दशकों पुराने रक्षा संबंध हैं। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में रूस अभी भी एशियाई शक्ति-संतुलन का महत्वपूर्ण घटक माना जाता है।
चीन की भूमिका
चीन विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। उसका आर्थिक प्रभाव लगातार बढ़ा है। साथ ही दक्षिण चीन सागर, ताइवान और भारत के साथ सीमा विवाद जैसे मुद्दों के कारण उसके पड़ोसी देशों के साथ कई मतभेद भी बने हुए हैं।
इसलिए एशियाई सहयोग की किसी भी कल्पना में इन जटिलताओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
क्या भारत-रूस-चीन साथ आ सकते हैं?
भारत, रूस और चीन पहले से ही कई बहुपक्षीय मंचों पर साथ कार्य करते हैं, जैसे—
BRICS
Shanghai Cooperation Organisation (SCO)
G20
इन मंचों का उद्देश्य आर्थिक सहयोग, विकास, आतंकवाद-रोधी सहयोग और बहुपक्षीय संवाद को बढ़ावा देना है।
हालाँकि भारत और चीन के बीच सीमा विवाद तथा विभिन्न रणनीतिक मतभेद इस सहयोग को सीमित भी करते हैं।
एशियाई एकता के संभावित लाभ
यदि एशियाई देशों के बीच सहयोग बढ़ता है तो—
व्यापार और निवेश में वृद्धि होगी।
ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।
स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ सकता है।
विज्ञान एवं तकनीकी सहयोग तेज होगा।
वैश्विक संस्थाओं में एशिया की आवाज़ मजबूत होगी।
प्रमुख चुनौतियाँ
लेकिन यह मार्ग आसान नहीं है।
भारत-चीन सीमा विवाद
चीन और कई पड़ोसी देशों के समुद्री विवाद
विभिन्न देशों की सुरक्षा प्राथमिकताएँ
अमेरिका, यूरोप और अन्य साझेदारों के साथ अलग-अलग संबंध
राजनीतिक व्यवस्थाओं में व्यापक अंतर
इन कारणों से पूर्ण राजनीतिक या सामरिक एकता निकट भविष्य में कठिन दिखाई देती है।
भारत के लिए संतुलित नीति क्यों आवश्यक है?
भारत आज—
अमेरिका के साथ तकनीकी और रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है।
रूस से रक्षा और ऊर्जा सहयोग बनाए हुए है।
जापान, यूरोप, खाड़ी देशों तथा ASEAN के साथ भी संबंध मजबूत कर रहा है।
यही "बहु-संरेखण" (Multi-alignment) भारत की वर्तमान विदेश नीति की प्रमुख विशेषता है।
क्या बहुध्रुवीय व्यवस्था विश्व के लिए बेहतर होगी?
बहुत से विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि विश्व में अनेक प्रभावशाली शक्तियाँ संतुलित रूप से कार्य करें, तो किसी एक देश का अत्यधिक प्रभाव कम हो सकता है और अंतरराष्ट्रीय निर्णय अधिक संतुलित हो सकते हैं। वहीं अन्य विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि कई प्रतिस्पर्धी शक्तियों के कारण तनाव और संघर्ष भी बढ़ सकते हैं।
इसलिए बहुध्रुवीय व्यवस्था तभी सफल हो सकती है जब उसके साथ अंतरराष्ट्रीय कानून, संवाद और सहयोग की भावना भी मजबूत हो।
निष्कर्ष
भारत, रूस और चीन सहित एशियाई देशों के बीच आर्थिक, तकनीकी और कूटनीतिक सहयोग का विस्तार वैश्विक शक्ति-संतुलन को प्रभावित कर सकता है। किंतु किसी भी प्रकार का सहयोग तभी टिकाऊ होगा जब वह संप्रभु समानता, अंतरराष्ट्रीय कानून, पारस्परिक सम्मान और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांतों पर आधारित हो।
भारत की विदेश नीति परंपरागत रूप से "वसुधैव कुटुम्बकम्", रणनीतिक स्वायत्तता और संवाद पर आधारित रही है। इसलिए भारत के लिए सबसे उपयुक्त मार्ग वही होगा जो राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे और एशिया सहित विश्व में शांति, स्थिरता और सहयोग को बढ़ावा दे।

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