जिस पाकिस्तान का हमदर्द है अमेरिका, वही है ईरानी परमाणु कार्यक्रम की रीढ़?

पश्चिम एशिया में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर दशकों से विवाद चलता रहा है। अमेरिका, इज़राइल और पश्चिमी देशों का आरोप रहा है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है, जबकि ईरान लगातार यह दावा करता रहा है कि उसका कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। लेकिन इस पूरे विवाद के बीच एक ऐसा तथ्य भी सामने आता है जो भू-राजनीति के कई विरोधाभासों को उजागर करता है—ईरान के परमाणु कार्यक्रम के विकास में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा होती रही है। विडंबना यह है कि जिस पाकिस्तान को अमेरिका दशकों तक आर्थिक और सैन्य सहायता देता रहा, उसी पाकिस्तान के वैज्ञानिक नेटवर्क पर ईरान, लीबिया और उत्तर कोरिया तक परमाणु तकनीक पहुँचाने के आरोप लगते रहे। यही कारण है कि कई विश्लेषक यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या ईरानी परमाणु कार्यक्रम की शुरुआती रीढ़ पाकिस्तान का परमाणु नेटवर्क था? परमाणु प्रसार का सबसे बड़ा नाम : ए.क्यू. खान ईरान के परमाणु कार्यक्रम की चर्चा पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक Abdul Qadeer Khan के बिना अधूरी है। पाकिस्तान में उन्हें "परमाणु बम का जनक" कहा जाता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनका नाम परमाणु तकनीक के प्रसार से भी जुड़ा रहा है। 2004 में पाकिस्तान ने स्वीकार किया कि ए.क्यू. खान के नेटवर्क ने कई देशों को संवेदनशील परमाणु तकनीक और उपकरण उपलब्ध कराए थे। अंतरराष्ट्रीय जांचों में ईरान का नाम भी सामने आया। यही वह बिंदु था जहाँ पाकिस्तान और ईरान के परमाणु कार्यक्रमों के बीच संबंधों की चर्चा तेज हुई। ईरान को क्या मिला? विशेषज्ञों के अनुसार 1980 और 1990 के दशक में ईरान को गैस सेंट्रीफ्यूज तकनीक से संबंधित डिजाइन और कुछ उपकरण प्राप्त हुए। सेंट्रीफ्यूज तकनीक यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि किसी देश के पास यह क्षमता विकसित हो जाती है, तो वह परमाणु ईंधन भी बना सकता है और सैद्धांतिक रूप से हथियार-ग्रेड सामग्री की दिशा में भी आगे बढ़ सकता है। इसी कारण ईरान के कार्यक्रम को लेकर पश्चिमी देशों की चिंता बढ़ी। अमेरिका की दुविधा यहाँ सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। शीत युद्ध के दौरान और उसके बाद भी पाकिस्तान लंबे समय तक अमेरिका का महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी रहा। अफगान युद्ध आतंकवाद विरोधी अभियान क्षेत्रीय संतुलन जैसे मुद्दों पर अमेरिका ने पाकिस्तान को व्यापक सहायता दी। लेकिन इसी अवधि में ए.क्यू. खान नेटवर्क सक्रिय रहा और बाद में उस पर परमाणु तकनीक के प्रसार के आरोप लगे। कई आलोचकों का तर्क है कि अमेरिका ने पाकिस्तान के प्रति रणनीतिक आवश्यकता के कारण कई बार अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाया। क्या पाकिस्तान वास्तव में ईरानी कार्यक्रम की रीढ़ था? इस प्रश्न का उत्तर पूरी तरह "हाँ" या "नहीं" में नहीं दिया जा सकता। ईरान का परमाणु कार्यक्रम केवल पाकिस्तान पर आधारित नहीं था। इसमें विभिन्न स्रोतों से प्राप्त तकनीक, स्वदेशी अनुसंधान, रूसी सहयोग और दशकों के वैज्ञानिक विकास की भूमिका रही है। लेकिन यह भी सच है कि प्रारंभिक चरण में पाकिस्तान के ए.क्यू. खान नेटवर्क से प्राप्त तकनीकी सहायता ने ईरान की प्रगति को गति दी थी। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि पाकिस्तान ईरानी परमाणु कार्यक्रम की "एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक कड़ी" था, न कि उसका एकमात्र आधार। भू-राजनीति का विरोधाभास इस पूरे प्रकरण का सबसे रोचक पहलू यह है कि अमेरिका एक ओर ईरान के परमाणु कार्यक्रम का विरोध करता रहा, जबकि दूसरी ओर उसका प्रमुख क्षेत्रीय सहयोगी पाकिस्तान उन आरोपों के केंद्र में रहा जिनसे ईरान के परमाणु कार्यक्रम को प्रारंभिक बढ़त मिली। यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति की उस वास्तविकता को उजागर करता है जिसमें राष्ट्रीय हित अक्सर घोषित सिद्धांतों से अधिक प्रभावशाली साबित होते हैं। भारत के दृष्टिकोण से भारत लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि परमाणु प्रसार के प्रश्न पर दोहरे मानदंड नहीं होने चाहिए। भारतीय दृष्टिकोण से ए.क्यू. खान नेटवर्क का मामला इस बात का उदाहरण है कि किस प्रकार गैर-जिम्मेदार तकनीकी हस्तांतरण क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। आज जब ईरान का परमाणु कार्यक्रम पश्चिम एशिया की राजनीति का केंद्रीय विषय बना हुआ है, तब उसके शुरुआती इतिहास में पाकिस्तान की भूमिका को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। निष्कर्ष "जिस पाकिस्तान का हमदर्द है अमेरिका, वही है ईरानी परमाणु कार्यक्रम की रीढ़"—यह शीर्षक राजनीतिक दृष्टि से आकर्षक अवश्य है, लेकिन वास्तविकता अधिक जटिल है। पाकिस्तान के ए.क्यू. खान नेटवर्क ने ईरान को महत्वपूर्ण तकनीकी सहायता पहुँचाने में भूमिका निभाई थी, लेकिन ईरान का वर्तमान परमाणु कार्यक्रम केवल उसी पर आधारित नहीं है। यह दशकों के वैज्ञानिक विकास, विदेशी सहयोग और स्वदेशी प्रयासों का परिणाम है। फिर भी यह तथ्य अंतरराष्ट्रीय राजनीति के एक बड़े विरोधाभास को उजागर करता है—कई बार किसी देश का रणनीतिक सहयोगी वही शक्ति साबित होता है, जिसकी गतिविधियाँ उन समस्याओं को जन्म देती हैं जिनसे निपटने का दावा महाशक्तियाँ करती हैं। यही भू-राजनीति की सबसे जटिल और विडंबनापूर्ण सच्चाइयों में से एक है।

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