निजीकरण का मोह और अर्थव्यवस्था की वास्तविक रीढ़

भारत में आर्थिक नीति पर होने वाली बहसों में एक विचार बार-बार सामने आता है कि निजीकरण ही विकास का सबसे प्रभावी मार्ग है। इस दृष्टिकोण के समर्थकों का तर्क है कि निजी क्षेत्र अधिक दक्ष, प्रतिस्पर्धी और नवाचारी होता है, इसलिए अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए सरकारी हस्तक्षेप को न्यूनतम किया जाना चाहिए। निस्संदेह, निजीकरण ने भारत में दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी, विमानन, डिजिटल सेवाओं और उपभोक्ता बाजारों के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन यह निष्कर्ष निकाल लेना कि निजीकरण अपने आप में आर्थिक समृद्धि और रोजगार सुरक्षा की गारंटी है, वास्तविकताओं का अत्यधिक सरलीकरण होगा। आर्थिक इतिहास बताता है कि निजी क्षेत्र विकास की गति तो बढ़ा सकता है, परंतु आर्थिक स्थिरता का आधार नहीं बन सकता। बाजार का स्वभाव चक्रीय होता है। लाभ बढ़ता है तो भर्ती बढ़ती है, लेकिन संकट आते ही छँटनी शुरू हो जाती है। पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक तकनीकी क्षेत्र में यही देखा गया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी तकनीकी कंपनियों ने हजारों कर्मचारियों की छँटनी की है और भारत का आईटी क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा। कई रिपोर्टों में यह संकेत मिला है कि तकनीकी क्षेत्र में एआई आधारित स्वचालन, वैश्विक मांग में कमी और लागत नियंत्रण की रणनीतियों के कारण भर्ती की गति धीमी हुई है तथा कुछ कंपनियों ने कार्यबल में कटौती की है। यह स्थिति केवल भारत तक सीमित नहीं है। वैश्विक तकनीकी उद्योग में 2026 के शुरुआती महीनों में ही एक लाख से अधिक नौकरियाँ समाप्त होने की खबरें सामने आईं। इससे स्पष्ट है कि निजी क्षेत्र की रोजगार क्षमता अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियों, तकनीकी बदलावों और निवेशकों की अपेक्षाओं पर अत्यधिक निर्भर रहती है। यहीं पर सरकारी नियोजन की भूमिका सामने आती है। किसी भी आधुनिक राष्ट्र की अर्थव्यवस्था केवल लाभ के सिद्धांत पर नहीं चल सकती। सड़कें, रेलवे, सिंचाई, सार्वजनिक स्वास्थ्य, विद्यालय, विश्वविद्यालय, न्यायपालिका, पुलिस व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा जैसी व्यवस्थाएँ बाजार नहीं बनाता; इन्हें राज्य विकसित करता है। भारत की आर्थिक संरचना का बड़ा हिस्सा सार्वजनिक निवेश पर आधारित है। राष्ट्रीय राजमार्गों से लेकर रेलवे नेटवर्क तक, अधिकांश आधारभूत ढाँचे का निर्माण सरकारी संसाधनों से हुआ है। निजी उद्योग उसी आधारभूत संरचना पर खड़े होकर अपना विस्तार करते हैं। सरकारी नियोजन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान मध्यवर्ग के निर्माण में दिखाई देता है। भारत का मध्यवर्ग केवल उपभोक्ता वर्ग नहीं है; वही देश की मांग, बचत और निवेश का सबसे स्थायी आधार है। शिक्षक, बैंककर्मी, रेलवे कर्मचारी, स्वास्थ्यकर्मी, अभियंता, प्रशासनिक अधिकारी और अन्य सार्वजनिक सेवक इस वर्ग की महत्वपूर्ण धुरी हैं। उनकी नियमित आय अर्थव्यवस्था में स्थिर मांग पैदा करती है। आर्थिक मंदी के समय भी यह वर्ग शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और उपभोग पर खर्च जारी रखता है, जिससे बाजार पूरी तरह ठहरता नहीं है। यही कारण है कि कुल रोजगार में सरकारी क्षेत्र की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम होने के बावजूद उसका आर्थिक महत्व बहुत बड़ा है। भारत की कुल कार्यशील आबादी लगभग 55 से 57 करोड़ मानी जाती है, जबकि सरकारी क्षेत्र में प्रत्यक्ष रूप से लगभग ढाई करोड़ लोग कार्यरत हैं। संख्या के दृष्टिकोण से यह हिस्सा छोटा दिख सकता है, लेकिन संगठित रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और मध्यवर्गीय स्थिरता में इसकी भूमिका अनुपात से कहीं अधिक है। कोविड-19 महामारी ने इस तथ्य को और स्पष्ट कर दिया। जब निजी क्षेत्र के लाखों कर्मचारी बेरोजगारी और आय संकट से जूझ रहे थे, तब सरकारी कर्मचारियों के वेतन जारी रहे। सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने करोड़ों लोगों को खाद्यान्न उपलब्ध कराया। स्वास्थ्य सेवाओं, टीकाकरण और राहत कार्यक्रमों का संचालन भी मुख्यतः सरकारी तंत्र ने किया। संकट की उस घड़ी में बाजार नहीं, बल्कि राज्य अर्थव्यवस्था का सहारा बना। इसका अर्थ यह नहीं कि निजीकरण का विरोध किया जाना चाहिए। निजी क्षेत्र आर्थिक प्रगति का महत्वपूर्ण इंजन है। नवाचार, प्रतिस्पर्धा और तकनीकी उन्नति के लिए उसकी भूमिका अनिवार्य है। लेकिन आर्थिक नीति का उद्देश्य केवल विकास दर बढ़ाना नहीं होना चाहिए; उसका उद्देश्य स्थिरता, रोजगार सुरक्षा और सामाजिक संतुलन भी होना चाहिए। यदि अर्थव्यवस्था पूरी तरह बाजार की शक्तियों पर छोड़ दी जाए तो वैश्विक संकटों का प्रभाव सीधे रोजगार और आय पर पड़ता है। भारत जैसे विशाल और सामाजिक रूप से विविध देश के लिए सबसे उपयुक्त मॉडल वह होगा जिसमें निजी उद्यमिता को प्रोत्साहन मिले, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत संरचना और रोजगार सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में राज्य की भूमिका मजबूत बनी रहे। निजीकरण को साधन के रूप में देखा जाना चाहिए, लक्ष्य के रूप में नहीं। वास्तविकता यह है कि निजी क्षेत्र अर्थव्यवस्था को गति देता है, लेकिन सरकारी नियोजन उसे दिशा देता है। निजी निवेश विकास की ऊर्जा पैदा करता है, लेकिन सार्वजनिक निवेश उसे स्थिरता प्रदान करता है। और इन दोनों के बीच वह मध्यवर्ग खड़ा होता है जो अर्थव्यवस्था की निरंतरता और सामाजिक संतुलन का सबसे बड़ा आधार है। इसलिए आज आवश्यकता निजीकरण और सरकारी हस्तक्षेप के बीच कृत्रिम संघर्ष खड़ा करने की नहीं, बल्कि दोनों के संतुलित समन्वय की है। आर्थिक इतिहास का अनुभव यही बताता है कि विकास का इंजन निजी क्षेत्र हो सकता है, परंतु अर्थव्यवस्था की वास्तविक रीढ़ अब भी सरकारी नियोजन और सशक्त मध्यवर्ग ही हैं।

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