भारत की आर्थिक बदहाली: आक्रामक नीतियाँ, कूटनीतिक असंतुलन और खोते अवसर

भारत आज विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक माना जाता है। सरकारें विकास, विश्वगुरु, पांच ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था और वैश्विक नेतृत्व के दावे करती हैं। दूसरी ओर बेरोज़गारी, महँगाई, प्रतिभा पलायन, कृषि संकट, रुपये की कमजोरी, बढ़ती असमानता और मध्यवर्ग की आर्थिक कठिनाइयाँ लगातार चर्चा का विषय बनी हुई हैं। प्रश्न यह है कि यदि भारत इतनी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, तो आम नागरिक का आर्थिक जीवन लगातार कठिन क्यों होता जा रहा है? इस प्रश्न का उत्तर केवल आर्थिक आँकड़ों में नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति, सरकारी नीतियों, विदेश नीति, सामाजिक प्रवृत्तियों और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में छिपा हुआ है। भारत की वर्तमान चुनौतियों को समझने के लिए आक्रामक सरकारी नीतियों, राजनीतिक बढ़बोलेपन, पड़ोसी देशों के साथ बिगड़ते संबंधों, "आपदा को अवसर" जैसी राजनीतिक अवधारणाओं, यूक्रेन–रूस युद्ध के दौरान अपनाई गई रणनीति, प्रतिभा पलायन, उच्च वर्ग की जमाखोरी, निम्न वर्ग की मुफ्तखोरी और मध्यवर्ग की दुर्दशा को एक साथ देखना होगा। नीतियों का आक्रामक स्वरूप और आर्थिक झटके किसी भी देश की अर्थव्यवस्था स्थिरता, पूर्वानुमेयता और विश्वास पर चलती है। जब सरकारें अचानक बड़े फैसले लेती हैं या अत्यधिक केंद्रीकृत ढंग से शासन चलाती हैं, तो उसका असर सबसे पहले छोटे व्यापारियों, किसानों और मध्यम वर्ग पर पड़ता है। भारत में पिछले वर्षों में यह धारणा मजबूत हुई है कि नीतियाँ व्यापक विमर्श की बजाय राजनीतिक संकल्प और प्रशासनिक शक्ति प्रदर्शन के आधार पर बनाई जा रही हैं। ऐसी स्थिति में नीतियों के वास्तविक प्रभावों का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप आर्थिक गतिविधियों में अनिश्चितता बढ़ती है और निवेशकों का विश्वास प्रभावित होता है। बढ़बोलापन बनाम वास्तविक उपलब्धियाँ किसी भी लोकतंत्र में नेतृत्व का आत्मविश्वास आवश्यक है, लेकिन जब आत्मविश्वास और बढ़बोलेपन की सीमा धुंधली हो जाती है, तब समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। भारत में राजनीतिक विमर्श का बड़ा हिस्सा अब घोषणाओं, नारों और छवि-निर्माण पर आधारित दिखाई देता है। आर्थिक चुनौतियों पर गंभीर बहस की बजाय भावनात्मक और प्रतीकात्मक मुद्दों को अधिक महत्व मिलता है। इससे जनता का ध्यान वास्तविक समस्याओं से हट जाता है, लेकिन समस्याएँ समाप्त नहीं होतीं। अर्थव्यवस्था प्रचार से नहीं, बल्कि उत्पादन, नवाचार, निवेश और रोजगार से मजबूत होती है। "आपदा को अवसर" : प्रेरक विचार या राजनीतिक जुमला? "आपदा को अवसर" मूल रूप से एक सकारात्मक अवधारणा है। संकट के समय नए अवसरों की खोज किसी भी समाज की शक्ति होती है। लेकिन आलोचकों का मानना है कि जब यह अवधारणा बेरोज़गारी, महामारी, आर्थिक संकट और सामाजिक कठिनाइयों के बीच राजनीतिक नारे में बदल जाती है, तब यह संवेदनहीन प्रतीत होने लगती है। कुछ विश्लेषकों का मत है कि इस प्रकार के नारों ने भारत की विदेश और आर्थिक नीति में भी एक अत्यधिक आत्मविश्वासी दृष्टिकोण को जन्म दिया। यह विश्वास कई बार यथार्थवादी आकलन की जगह लेने लगा। चीन के साथ संबंध और शक्ति प्रदर्शन की राजनीति China भारत का सबसे बड़ा पड़ोसी और प्रमुख आर्थिक प्रतिद्वंद्वी है। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा लंबे समय से मौजूद हैं। आलोचकों का तर्क है कि चीन के प्रति कठोर सार्वजनिक बयानबाजी ने घरेलू राजनीति में तो लाभ दिया, लेकिन इससे वास्तविक रणनीतिक संतुलन स्थापित नहीं हो सका। दूसरी ओर चीन ने अपनी आर्थिक, औद्योगिक और तकनीकी क्षमता को लगातार बढ़ाया। यदि किसी देश की विदेश नीति का बड़ा हिस्सा सार्वजनिक शक्ति प्रदर्शन पर आधारित हो जाए और आर्थिक क्षमता उसके अनुरूप विकसित न हो, तो दीर्घकाल में असंतुलन उत्पन्न हो सकता है। यूक्रेन–रूस युद्ध और भारत की दुविधा Russian invasion of Ukraine ने वैश्विक राजनीति को बदल दिया। भारत ने इस संघर्ष में प्रत्यक्ष पक्ष लेने से परहेज किया और रणनीतिक स्वायत्तता की नीति अपनाई। समर्थकों का तर्क है कि इससे भारत को सस्ता तेल, ऊर्जा सुरक्षा और स्वतंत्र विदेश नीति का लाभ मिला। लेकिन आलोचकों का मत है कि भारत की स्थिति कई बार अवसरवादी तटस्थता जैसी प्रतीत हुई। उनका तर्क है कि भारत ने न तो रूस का खुला समर्थन किया और न ही पश्चिमी देशों की अपेक्षाओं के अनुरूप स्पष्ट रुख अपनाया। परिणामस्वरूप भारत को दोनों पक्षों के बीच लगातार संतुलन साधना पड़ा। कुछ आलोचक यह भी मानते हैं कि भारत की सार्वजनिक बयानबाजी और कूटनीतिक संकेतों ने अमेरिका तथा पश्चिमी देशों के भीतर संदेह पैदा किया, जबकि रूस को भी यह संदेश गया कि संकट के समय भारत उसके साथ पहले जैसी स्पष्टता से खड़ा नहीं है। रूस-चीन निकटता और भारत की रणनीतिक चुनौती Russia और चीन के संबंध यूक्रेन युद्ध से पहले भी मजबूत हो रहे थे, लेकिन युद्ध के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों ने रूस को चीन के और निकट ला दिया। भारत के कुछ रणनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यदि रूस अत्यधिक रूप से चीन पर निर्भर हो जाता है, तो यह भारत के दीर्घकालिक हितों के लिए चुनौती हो सकती है। दशकों तक रूस भारत का प्रमुख सामरिक साझेदार रहा है। यदि रूस की प्राथमिकताएँ चीन-केंद्रित हो जाएँ, तो भारत का रणनीतिक विकल्प सीमित हो सकता है। पड़ोसियों से बिगड़ते संबंध भारत की आर्थिक प्रगति केवल उसकी आंतरिक शक्ति पर निर्भर नहीं करती। दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है। Bangladesh, Nepal, Sri Lanka और अन्य पड़ोसी देशों के साथ विश्वासपूर्ण संबंध व्यापार, ऊर्जा, परिवहन और निवेश के नए अवसर पैदा कर सकते हैं। जब संबंध तनावपूर्ण होते हैं, तो आर्थिक संभावनाएँ भी सीमित हो जाती हैं। भूगोल को बदला नहीं जा सकता; इसलिए पड़ोस के साथ सहयोग किसी भी दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति का आवश्यक भाग होता है। प्रतिभा पलायन : सबसे बड़ी आर्थिक क्षति भारत हर वर्ष लाखों इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ तैयार करता है। लेकिन उनमें से बड़ी संख्या विदेशों में अवसर तलाशती है। यह केवल लोगों का पलायन नहीं, बल्कि निवेश, ज्ञान और नवाचार का पलायन भी है। जब सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएँ विदेशों में अपना भविष्य देखती हैं, तो देश की उत्पादक क्षमता कमजोर होती है। उच्च वर्ग की जमाखोरी, निम्न वर्ग की मुफ्तखोरी और मध्यवर्ग का संकट भारत का आर्थिक ढाँचा एक विचित्र त्रिकोण में बदलता दिखाई देता है। एक ओर उच्च वर्ग संपत्ति, भूमि, संसाधनों और पूँजी का अत्यधिक संचय कर रहा है। दूसरी ओर निम्न वर्ग को विभिन्न प्रकार की मुफ्त योजनाओं का लाभ मिल रहा है। इन दोनों के बीच फँसा हुआ है मध्यवर्ग। मध्यवर्ग कर देता है, महँगाई झेलता है, निजी शिक्षा और स्वास्थ्य का खर्च उठाता है, लेकिन उसे न तो बड़े पूँजीगत लाभ मिलते हैं और न ही व्यापक सरकारी सहायता। परिणामस्वरूप उसका आर्थिक और सामाजिक दबाव लगातार बढ़ता जाता है। सोशल मीडिया और वास्तविकता से दूरी सोशल मीडिया ने लोकतांत्रिक संवाद के नए अवसर दिए, लेकिन इसके साथ सतही लोकप्रियता और तात्कालिक उत्तेजना की संस्कृति भी विकसित हुई। गंभीर आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक प्रश्नों की जगह अक्सर वायरल सामग्री, प्रचार और मनोरंजन प्रमुख हो जाते हैं। इससे समाज का ध्यान वास्तविक चुनौतियों से भटक सकता है। निष्कर्ष भारत की वर्तमान आर्थिक और सामाजिक चुनौतियाँ किसी एक कारण का परिणाम नहीं हैं। आक्रामक सरकारी नीतियाँ, राजनीतिक बढ़बोलापन, "आपदा को अवसर" जैसे नारों का अत्यधिक प्रयोग, चीन के साथ तनाव, यूक्रेन–रूस युद्ध में जटिल कूटनीतिक संतुलन, रूस-चीन निकटता, पड़ोसियों से बिगड़ते संबंध, प्रतिभा पलायन, उच्च वर्ग की जमाखोरी, निम्न वर्ग की मुफ्तखोरी और मध्यवर्ग पर बढ़ता दबाव—ये सभी मिलकर एक जटिल परिदृश्य निर्मित करते हैं। फिर भी यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इन विषयों पर अलग-अलग विशेषज्ञों के मत भिन्न हो सकते हैं। किसी भी राष्ट्र की सफलता अंततः नारों, प्रचार और शक्ति प्रदर्शन से नहीं, बल्कि मजबूत संस्थाओं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, उत्पादक रोजगार, वैज्ञानिक नवाचार, सामाजिक विश्वास और संतुलित कूटनीति से तय होती है। यदि भारत को दीर्घकालिक समृद्धि प्राप्त करनी है, तो उसे राजनीतिक उत्साह से अधिक आर्थिक यथार्थवाद और संस्थागत मजबूती पर ध्यान देना होगा।

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