रेयर अर्थ मिनरल की वैश्विक दौड़ में भारत कहाँ खड़ा है?

जब दुनिया रेयर अर्थ मिनरल को 21वीं सदी के "नए तेल" के रूप में देख रही है, तब भारत की स्थिति विरोधाभासों से भरी हुई दिखाई देती है। एक ओर भारत के पास विशाल समुद्री तट, महत्वपूर्ण खनिज भंडार, बढ़ता औद्योगिक आधार और दुनिया की सबसे तेज़ी से विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं में से एक होने का लाभ है। दूसरी ओर, खनन, प्रसंस्करण और उच्च तकनीकी विनिर्माण के क्षेत्र में वह अभी भी चीन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से पीछे है। इसलिए भारत की स्थिति को एक वाक्य में कहा जाए तो—भारत संभावनाओं के शिखर पर खड़ा है, लेकिन अभी शक्ति के शिखर तक नहीं पहुँचा है। संसाधनों की दृष्टि से भारत कमजोर नहीं भारत के पास रेयर अर्थ तत्वों के महत्वपूर्ण भंडार मौजूद हैं। विशेष रूप से— केरल तमिलनाडु ओडिशा आंध्र प्रदेश के समुद्री तटीय क्षेत्रों में मोनाजाइट जैसे खनिज पाए जाते हैं, जिनसे कई मूल्यवान रेयर अर्थ तत्व प्राप्त किए जा सकते हैं। विश्व स्तर पर भारत के भंडार बहुत छोटे नहीं माने जाते। समस्या संसाधनों की उपलब्धता नहीं, बल्कि उनके दोहन और प्रसंस्करण की सीमित क्षमता है। यही कारण है कि भारत के पास खनिज तो हैं, लेकिन वह अभी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का निर्णायक खिलाड़ी नहीं बन पाया है। चीन और भारत का अंतर भारत और चीन के बीच सबसे बड़ा अंतर खदानों का नहीं बल्कि दृष्टि और निवेश का है। 1980 के दशक में चीन ने रेयर अर्थ उद्योग को राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा बनाया। उसने खनन, प्रसंस्करण, अनुसंधान और विनिर्माण को एक साथ विकसित किया। भारत लंबे समय तक इन संसाधनों को मुख्यतः परमाणु कार्यक्रम और सीमित औद्योगिक उपयोग के संदर्भ में देखता रहा। परिणामस्वरूप आज चीन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का केंद्र है, जबकि भारत अभी भी अपनी क्षमताओं का विस्तार करने की प्रक्रिया में है। भारत की सबसे बड़ी कमजोरी : प्रसंस्करण क्षमता रेयर अर्थ उद्योग में सबसे अधिक मूल्य खनन में नहीं बल्कि प्रसंस्करण में जुड़ता है। कच्चे अयस्क से उपयोगी धातु निकालना अत्यंत जटिल तकनीकी प्रक्रिया है। यही वह क्षेत्र है जहाँ चीन ने वैश्विक प्रभुत्व स्थापित किया है। भारत में अभी पर्याप्त प्रसंस्करण अवसंरचना विकसित नहीं हो पाई है। यदि भारत केवल कच्चा खनिज निकाले और प्रसंस्करण विदेशों में हो, तो वास्तविक आर्थिक और रणनीतिक लाभ सीमित रहेंगे। इसलिए भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती नई खदानें नहीं, बल्कि आधुनिक प्रसंस्करण संयंत्रों का निर्माण है। भारत के सामने अवसर क्यों बढ़ रहे हैं? दुनिया बदल रही है। अमेरिका, जापान और यूरोप अब चीन पर अत्यधिक निर्भरता कम करना चाहते हैं। वे ऐसे साझेदारों की तलाश में हैं जो लोकतांत्रिक, स्थिर और दीर्घकालिक सहयोगी हों। भारत इस आवश्यकता को पूरा कर सकता है। कई वैश्विक कंपनियाँ अपनी आपूर्ति श्रृंखला का विविधीकरण कर रही हैं। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, रक्षा उपकरण और सेमीकंडक्टर उद्योग के विस्तार से भारत के लिए नए अवसर पैदा हुए हैं। यह पहली बार है जब वैश्विक भू-राजनीति और भारत की औद्योगिक महत्वाकांक्षाएँ एक ही दिशा में आगे बढ़ती दिखाई दे रही हैं। आत्मनिर्भर भारत और रेयर अर्थ भारत की "आत्मनिर्भर भारत" नीति का एक महत्वपूर्ण लेकिन कम चर्चित पहलू रेयर अर्थ उद्योग हो सकता है। यदि भारत को— इलेक्ट्रिक वाहनों में अग्रणी बनना है, रक्षा उपकरणों का निर्यातक बनना है, सेमीकंडक्टर उद्योग विकसित करना है, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित हार्डवेयर उत्पादन में आगे बढ़ना है, तो उसे रेयर अर्थ आपूर्ति श्रृंखला में मजबूत स्थान बनाना होगा। अन्यथा भारत अंतिम उत्पाद तो बनाएगा, लेकिन महत्वपूर्ण कच्चे माल के लिए बाहरी शक्तियों पर निर्भर रहेगा। QUAD में भारत की भूमिका Quadrilateral Security Dialogue के भीतर भारत की भूमिका विशेष महत्व रखती है। अमेरिका पूंजी और तकनीक दे सकता है। जापान उन्नत विनिर्माण विशेषज्ञता दे सकता है। ऑस्ट्रेलिया खनिज संसाधन दे सकता है। भारत बड़े पैमाने पर विनिर्माण और बाजार उपलब्ध करा सकता है। इस दृष्टि से भारत केवल QUAD का सदस्य नहीं, बल्कि संभावित औद्योगिक केंद्र बन सकता है। यदि भारत सही रणनीति अपनाता है तो वह चीन के विकल्प के रूप में उभरती वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का प्रमुख आधार बन सकता है। चुनौतियाँ जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता भारत के सामने कुछ गंभीर चुनौतियाँ भी हैं— 1. नीति और मंजूरी की धीमी प्रक्रिया खनन परियोजनाओं और औद्योगिक निवेशों को अक्सर लंबी प्रशासनिक प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ता है। 2. तकनीकी अंतर उच्च स्तरीय प्रसंस्करण तकनीक में अभी भी भारत को वैश्विक सहयोग की आवश्यकता है। 3. पर्यावरणीय संतुलन रेयर अर्थ खनन और प्रसंस्करण से पर्यावरणीय जोखिम जुड़े होते हैं। भारत को विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाना होगा। 4. निवेश की आवश्यकता यह क्षेत्र दीर्घकालिक और पूंजी-गहन है। सरकार और निजी क्षेत्र दोनों को बड़े निवेश करने होंगे। भारत की वास्तविक स्थिति यदि वैश्विक दौड़ को तीन श्रेणियों में बाँटा जाए, तो तस्वीर कुछ ऐसी दिखती है— पहला स्तर: चीन — निर्विवाद नेता। दूसरा स्तर: अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कुछ हद तक जापान — मजबूत चुनौतीकर्ता। तीसरा स्तर: भारत — उभरती हुई शक्ति, जिसके पास विशाल संभावनाएँ हैं लेकिन अभी क्षमता निर्माण जारी है। भारत अभी शीर्ष पर नहीं है, लेकिन उसके पास शीर्ष समूह में प्रवेश करने का अवसर मौजूद है। निष्कर्ष : अवसर का दशक रेयर अर्थ मिनरल की राजनीति केवल खनिजों की राजनीति नहीं है। यह तकनीकी प्रभुत्व, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा क्षमता और भविष्य की आर्थिक शक्ति की राजनीति है। भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। उसके पास संसाधन हैं, बाजार है, जनशक्ति है और वैश्विक समर्थन भी प्राप्त हो रहा है। लेकिन इन संभावनाओं को वास्तविक शक्ति में बदलने के लिए दीर्घकालिक रणनीति, तकनीकी निवेश और राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होगी। यदि 20वीं सदी तेल की राजनीति की सदी थी, तो 21वीं सदी रेयर अर्थ मिनरल की राजनीति की सदी बन सकती है। और इस नई प्रतिस्पर्धा में भारत अभी दर्शक नहीं, बल्कि एक संभावित खिलाड़ी है। प्रश्न केवल इतना है कि क्या भारत इस अवसर को समय रहते पहचानकर उसे राष्ट्रीय शक्ति में बदल पाएगा, या फिर एक बार फिर किसी अन्य शक्ति के बनाए खेल में भागीदार भर बनकर रह जाएगा। यही आने वाले दशक का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न होगा।

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