अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति: भारत नहीं, जापान है पहली पसंद — क्या भारत की शांतिप्रिय विदेश नीति उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक कमजोरी बन गई है?
विश्व राजनीति में मित्रता का मूल्य नैतिकता से नहीं, बल्कि रणनीतिक उपयोगिता से तय होता है। राष्ट्र स्थायी मित्र नहीं बनाते, वे स्थायी हितों का अनुसरण करते हैं। यही सिद्धांत आज अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति को समझने की कुंजी है। भारत में अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण अमेरिका की एशियाई रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ भारत है। लेकिन यदि पिछले सात दशकों के अमेरिकी व्यवहार को देखा जाए, तो एक अलग तस्वीर सामने आती है। लेखक का तर्क है कि अमेरिका के लिए एशिया में सबसे विश्वसनीय और केंद्रीय रणनीतिक साझेदार आज भी जापान है, जबकि भारत को वह एक महत्वपूर्ण, परंतु स्वतंत्र और परिस्थितिनिष्ठ साझेदार के रूप में देखता है।
यह अंतर केवल शब्दों का नहीं, बल्कि रणनीतिक प्राथमिकताओं का है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने जापान के पुनर्निर्माण में व्यापक आर्थिक, तकनीकी और सुरक्षा निवेश किया। समय के साथ दोनों देशों के बीच सुरक्षा संधि बनी, अमेरिकी सैन्य अड्डे स्थापित हुए और जापान अमेरिकी सुरक्षा संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। इसके विपरीत भारत ने गुटनिरपेक्षता और बाद में रणनीतिक स्वायत्तता का मार्ग चुना। इससे भारत ने निर्णय लेने की स्वतंत्रता तो बनाए रखी, लेकिन औपचारिक सैन्य गठबंधन से दूरी भी बनी रही।
यहीं से दोनों देशों की रणनीतिक यात्रा अलग हो जाती है।
अमेरिका जानता है कि यदि कल पूर्वी एशिया में संकट उत्पन्न होता है, तो जापान संधि के आधार पर उसके साथ खड़ा होगा। भारत का निर्णय, स्वाभाविक रूप से, उसके अपने राष्ट्रीय हितों पर निर्भर करेगा। यही कारण है कि दोनों देशों के साथ अमेरिकी संबंधों का स्वरूप अलग है। यह अंतर किसी एक देश की श्रेष्ठता या हीनता का नहीं, बल्कि उनके अलग-अलग रणनीतिक विकल्पों का परिणाम है।
भारत के पास विशाल जनसंख्या, बड़ा बाजार और तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। फिर भी, लेखक का मत है कि केवल इन कारणों से कोई देश किसी महाशक्ति की पहली रणनीतिक पसंद नहीं बन जाता। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भरोसा, दीर्घकालिक संस्थागत सहयोग, रक्षा ढाँचा और संकट के समय पूर्वानुमेय व्यवहार भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।
यहीं भारत की विदेश नीति पर प्रश्न उठते हैं।
भारत ने लंबे समय तक यह विश्वास रखा कि वह सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रख सकता है। इस नीति के कई लाभ भी मिले। भारत अमेरिका के साथ भी साझेदारी करता है, रूस से भी रक्षा सहयोग रखता है, यूरोप के साथ भी संबंध मजबूत करता है और वैश्विक दक्षिण की आवाज़ भी उठाता है। लेकिन लेखक के अनुसार, इसी नीति का दूसरा पक्ष यह है कि कोई भी महाशक्ति भारत को उसी श्रेणी में नहीं रखती, जिस श्रेणी में वह अपने औपचारिक सुरक्षा सहयोगियों को रखती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता गलत है। बल्कि प्रश्न यह है कि क्या भारत ने इस स्वायत्तता के साथ अपनी आर्थिक, तकनीकी और सैन्य शक्ति को इतनी तेज़ी से बढ़ाया कि वह अपरिहार्य बन सके? यदि नहीं, तो समस्या स्वायत्तता नहीं, बल्कि उसके साथ पर्याप्त शक्ति-संचय न कर पाना है।
लेखक का एक और तर्क है कि भारत की विदेश नीति में नैतिकता और संयम का महत्व रहा है। यह भारत की सभ्यतागत पहचान का हिस्सा है। किंतु वैश्विक शक्ति-संतुलन केवल नैतिक अपील से नहीं चलता। इतिहास बताता है कि जिन देशों ने आर्थिक क्षमता, तकनीकी श्रेष्ठता और रक्षा तैयारी को प्राथमिकता दी, वही वैश्विक निर्णयों पर अधिक प्रभाव डाल सके।
इसीलिए भारत के सामने आज चुनौती यह नहीं है कि वह जापान जैसा बने या किसी सैन्य गठबंधन में शामिल हो जाए। वास्तविक चुनौती यह है कि वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए ऐसी शक्ति अर्जित करे कि अन्य देश उसके साथ संबंध इसलिए न बढ़ाएँ कि वह किसी तीसरे देश का संतुलन बना सके, बल्कि इसलिए कि भारत स्वयं वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता रखता हो।
इस संदर्भ में अमेरिका–भारत संबंधों को भी यथार्थवादी दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। दोनों देशों के बीच रक्षा, प्रौद्योगिकी, व्यापार और हिंद-प्रशांत में सहयोग बढ़ा है। यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन यह मान लेना कि भारत ने जापान का स्थान ले लिया है या अमेरिका की एशियाई रणनीति का अकेला केंद्र बन गया है, उपलब्ध तथ्यों से समर्थित निष्कर्ष नहीं होगा। जापान और भारत की भूमिकाएँ अलग-अलग हैं और अमेरिका दोनों को अलग कारणों से महत्व देता है।
लेखक का निष्कर्ष यह है कि भारत को अपनी विदेश नीति का मूल्यांकन भावनाओं से नहीं, बल्कि परिणामों के आधार पर करना चाहिए। यदि भारत आने वाले दशकों में विश्व व्यवस्था का प्रमुख निर्माता बनना चाहता है, तो उसे अपनी आर्थिक शक्ति, रक्षा औद्योगिक आधार, तकनीकी नवाचार और कूटनीतिक प्रभाव—इन चारों स्तंभों को समान रूप से मजबूत करना होगा। तभी उसकी रणनीतिक स्वायत्तता एक आदर्श नहीं, बल्कि वास्तविक शक्ति का आधार बनेगी।
भारत के लिए सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि अमेरिका जापान को अधिक महत्व देता है या नहीं। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भारत स्वयं ऐसी शक्ति बनने की दिशा में बढ़ रहा है, जिसे कोई भी वैश्विक व्यवस्था नज़रअंदाज़ न कर सके। यही प्रश्न आने वाले दशकों में भारत की विदेश नीति की सफलता या असफलता तय करेगा।









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