जब प्रतिभा व्यवस्था से हार जाती है
भारत: प्रतिभाओं की कब्रगाह — एक राष्ट्र की सबसे बड़ी त्रासदी
भारत को अक्सर युवा देश, ज्ञान की भूमि, विश्वगुरु और उभरती हुई महाशक्ति कहा जाता है। यहाँ करोड़ों युवा हैं, हजारों विश्वविद्यालय हैं, विश्वस्तरीय वैज्ञानिक हैं, उत्कृष्ट लेखक हैं, कलाकार हैं, इंजीनियर हैं, डॉक्टर हैं और उद्यमी हैं। फिर भी समय-समय पर यह प्रश्न उठता है कि क्या भारत वास्तव में अपनी प्रतिभाओं का सम्मान करता है? या फिर यह एक ऐसा देश बनता जा रहा है जहाँ प्रतिभाएँ जन्म तो लेती हैं, लेकिन अपनी पूर्ण क्षमता तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देती हैं?
"भारत प्रतिभाओं की कब्रगाह है"—यह कथन कठोर अवश्य है, लेकिन इसके पीछे एक गहरी सामाजिक और राजनीतिक पीड़ा छिपी हुई है। यह केवल उन लोगों की शिकायत नहीं है जो अवसर नहीं पा सके, बल्कि उन लोगों का अनुभव भी है जिन्होंने देखा कि योग्यता से अधिक महत्व संपर्कों, चाटुकारिता, राजनीतिक निष्ठा, जातीय समीकरणों, पारिवारिक विरासत और आर्थिक शक्ति को मिलता है।
प्रतिभा और व्यवस्था का संघर्ष
भारत में प्रतिभा की कमी कभी नहीं रही। समस्या प्रतिभा के उत्पादन की नहीं, उसके संरक्षण और उपयोग की रही है।
हर वर्ष लाखों विद्यार्थी कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेते हैं। लाखों युवा विज्ञान, साहित्य, कला और तकनीक के क्षेत्र में कुछ नया करने का सपना देखते हैं। लेकिन बहुत जल्दी उनका सामना एक ऐसी व्यवस्था से होता है जहाँ मौलिकता की तुलना में आज्ञाकारिता अधिक पुरस्कृत होती है।
विद्यालयों में प्रश्न पूछने के बजाय उत्तर रटने की संस्कृति विकसित की जाती है। विश्वविद्यालयों में शोध की तुलना में डिग्री अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। सरकारी संस्थानों में कई बार नवाचार से अधिक वरिष्ठता का महत्व होता है। परिणामस्वरूप रचनात्मक प्रतिभाएँ धीरे-धीरे हतोत्साहित होने लगती हैं।
ब्रेन ड्रेन: प्रतिभाओं का पलायन
यदि भारत प्रतिभाओं का सम्मान करता है तो फिर लाखों प्रतिभाशाली युवा विदेश क्यों जाते हैं?
अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के अनेक देशों में भारतीय मूल के वैज्ञानिक, प्रोफेसर, इंजीनियर और उद्यमी नेतृत्वकारी भूमिकाओं में हैं।
यह केवल अधिक वेतन का प्रश्न नहीं है।
यह सम्मान, स्वतंत्रता और अवसर का भी प्रश्न है।
विदेशों में शोधकर्ता को प्रयोगशाला, संसाधन और स्वतंत्रता मिलती है। उसे यह भरोसा होता है कि उसके विचारों का मूल्यांकन उनकी गुणवत्ता के आधार पर होगा।
भारत में अनेक प्रतिभाशाली युवाओं को लगता है कि उनकी सफलता योग्यता से अधिक नेटवर्क और प्रभाव पर निर्भर करती है।
यही कारण है कि देश का श्रेष्ठ मानव संसाधन अक्सर विदेशों की ओर आकर्षित होता है।
शिक्षा प्रणाली की विफलता
भारत की शिक्षा प्रणाली आज भी औपनिवेशिक ढाँचे की अनेक कमजोरियों से ग्रस्त है।
यह प्रणाली स्वतंत्र चिंतन की अपेक्षा आज्ञापालन को बढ़ावा देती है।
एक विद्यार्थी यदि पुस्तक से अलग सोचता है तो उसे प्रोत्साहित करने के बजाय कई बार अनुशासनहीन माना जाता है।
विश्वविद्यालयों में शोध की संस्कृति सीमित है। अधिकांश संस्थान ज्ञान के निर्माण के बजाय ज्ञान के वितरण तक सीमित हैं।
विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय केवल भवनों और बजट से नहीं बनते। वे स्वतंत्र विचार, बौद्धिक साहस और आलोचनात्मक सोच से बनते हैं।
जब तक भारतीय शिक्षा प्रणाली इन मूलभूत परिवर्तनों को स्वीकार नहीं करेगी, तब तक प्रतिभाओं का दमन जारी रहेगा।
राजनीति और प्रतिभा
भारत की राजनीति में भी प्रतिभा का संकट दिखाई देता है।
राजनीतिक दलों में विचारकों और नीति-विशेषज्ञों की तुलना में निष्ठावान कार्यकर्ताओं को अधिक महत्व मिलता है।
वंशवाद और व्यक्तिपूजा ने लोकतांत्रिक नेतृत्व निर्माण की प्रक्रिया को कमजोर किया है।
ऐसे वातावरण में स्वतंत्र और मौलिक सोच रखने वाले लोग राजनीति से दूर हो जाते हैं।
परिणामस्वरूप नीति-निर्माण की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
विज्ञान और अनुसंधान की उपेक्षा
भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में से एक है, लेकिन अनुसंधान एवं विकास पर उसका खर्च अनेक विकसित देशों की तुलना में काफी कम है।
वैज्ञानिकों को अक्सर अपर्याप्त संसाधनों, जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाओं और सीमित संस्थागत समर्थन का सामना करना पड़ता है।
सी. वी. रमन, होमी भाभा, विक्रम साराभाई और ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जैसे वैज्ञानिकों ने विपरीत परिस्थितियों में भी महान कार्य किए, लेकिन किसी राष्ट्र की नीति असाधारण व्यक्तियों पर निर्भर नहीं हो सकती।
एक आधुनिक राष्ट्र को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जहाँ सामान्य प्रतिभाएँ भी असाधारण उपलब्धियाँ हासिल कर सकें।
साहित्य और कला का संकट
प्रतिभाओं की उपेक्षा केवल विज्ञान तक सीमित नहीं है।
साहित्य, संगीत, रंगमंच और कला के क्षेत्र में भी अनेक प्रतिभाशाली लोग संघर्ष करते हैं।
कई बार पुरस्कार, मंच और अवसर योग्यता से अधिक प्रभावशाली समूहों के नियंत्रण में दिखाई देते हैं।
सोशल मीडिया के दौर में लोकप्रियता और गुणवत्ता के बीच का अंतर भी धुंधला हो गया है।
जो व्यक्ति गहरी और गंभीर रचनाएँ करता है, वह अक्सर भीड़ में दब जाता है, जबकि सतही सामग्री व्यापक प्रसिद्धि प्राप्त कर लेती है।
नौकरशाही और नवाचार
भारत की नौकरशाही का निर्माण प्रशासनिक स्थिरता के लिए हुआ था, लेकिन कई बार वही व्यवस्था नवाचार के मार्ग में बाधा बन जाती है।
नए विचारों को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।
जो व्यक्ति व्यवस्था को चुनौती देता है, वह कई बार परेशानी में पड़ जाता है।
ऐसे वातावरण में रचनात्मकता और जोखिम लेने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है।
सामाजिक संरचना की बाधाएँ
भारत की सामाजिक संरचना भी प्रतिभाओं के विकास में बाधा उत्पन्न करती है।
जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र और पारिवारिक पृष्ठभूमि आज भी अनेक अवसरों को प्रभावित करते हैं।
कई प्रतिभाशाली युवाओं को अपने सपनों से पहले सामाजिक पूर्वाग्रहों से लड़ना पड़ता है।
जब समाज जन्म को योग्यता से अधिक महत्व देता है, तब प्रतिभा का दमन लगभग निश्चित हो जाता है।
असहमति का संकट
किसी भी समाज की प्रगति उसके आलोचकों पर भी निर्भर करती है।
महान विचारक प्रायः यथास्थिति को चुनौती देते हैं।
लेकिन जब असहमति को राष्ट्र-विरोध, संस्कृति-विरोध या व्यवस्था-विरोध मान लिया जाता है, तब रचनात्मक ऊर्जा का ह्रास होने लगता है।
प्रतिभा को स्वतंत्रता चाहिए।
वह भय और अनुरूपता के वातावरण में विकसित नहीं हो सकती।
विश्वगुरु बनने का दावा और वास्तविकता
भारत को विश्वगुरु बनाने की बातें अक्सर की जाती हैं।
लेकिन विश्वगुरु बनने का अर्थ केवल आर्थिक विकास या सैन्य शक्ति नहीं है।
विश्वगुरु वह राष्ट्र बनता है जो ज्ञान का निर्माण करे, विज्ञान को आगे बढ़ाए, नए विचार दे और मानवता को नई दिशा प्रदान करे।
यदि प्रतिभाएँ ही उपेक्षित रहेंगी तो यह लक्ष्य केवल राजनीतिक नारा बनकर रह जाएगा।
क्या भारत सचमुच प्रतिभाओं की कब्रगाह है?
इस प्रश्न का उत्तर पूरी तरह "हाँ" या "नहीं" में नहीं दिया जा सकता।
भारत ने असंख्य सफल वैज्ञानिक, उद्योगपति, लेखक और कलाकार दिए हैं।
देश में स्टार्टअप संस्कृति विकसित हुई है।
डिजिटल क्रांति ने नए अवसर पैदा किए हैं।
लेकिन साथ ही यह भी सत्य है कि करोड़ों प्रतिभाएँ अवसरों के अभाव, संस्थागत कमजोरियों और सामाजिक बाधाओं के कारण अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुँच पातीं।
समस्या प्रतिभा की कमी नहीं, प्रतिभा के प्रबंधन की है।
आगे का रास्ता
यदि भारत को प्रतिभाओं की कब्रगाह कहलाने से बचना है तो उसे कुछ बुनियादी परिवर्तन करने होंगे—
शिक्षा को रटंत व्यवस्था से मुक्त करना होगा।
शोध और नवाचार में निवेश बढ़ाना होगा।
विश्वविद्यालयों को अधिक स्वायत्तता देनी होगी।
योग्यता आधारित अवसरों को बढ़ावा देना होगा।
कला, साहित्य और विज्ञान को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करना होगा।
असहमति और आलोचना को लोकतंत्र की शक्ति के रूप में स्वीकार करना होगा।
नौकरशाही को अधिक उत्तरदायी और नवाचार-अनुकूल बनाना होगा।
निष्कर्ष
किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी संपत्ति उसकी खदानें, उसके हथियार या उसकी इमारतें नहीं होतीं। उसकी सबसे बड़ी संपत्ति उसके प्रतिभाशाली नागरिक होते हैं।
भारत की त्रासदी यह नहीं कि यहाँ प्रतिभाएँ नहीं हैं। त्रासदी यह है कि यहाँ प्रतिभाएँ अक्सर अपनी क्षमता के अनुरूप वातावरण नहीं पातीं।
जब कोई वैज्ञानिक विदेश चला जाता है, कोई लेखक हाशिए पर चला जाता है, कोई कलाकार अवसरों के अभाव में टूट जाता है, या कोई युवा व्यवस्था से निराश होकर अपने सपनों का त्याग कर देता है, तब केवल एक व्यक्ति नहीं हारता—पूरा राष्ट्र हारता है।
भारत का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अपनी प्रतिभाओं को सम्मान देता है या उन्हें संघर्ष, उपेक्षा और निराशा की कब्र में दफन होने के लिए छोड़ देता है। यदि भारत अपनी प्रतिभाओं को पहचानना और उन्हें उड़ान देना सीख गया, तो वह केवल एक शक्तिशाली राष्ट्र नहीं, बल्कि एक महान सभ्यता-राष्ट्र बन सकता है। यदि नहीं, तो "प्रतिभाओं की कब्रगाह" का यह आरोप बार-बार उसके सामने खड़ा रहेगा।
apada men avasar ke nare ne bharat ki arthvyavastha ko apda men la khadab ki. akramakata lokatantrik vishv ko bardasht nahin. mukhata hi sahi lokatantrikataa hi vyapar niti hai
आपदा में अवसर से आपदा की अर्थव्यवस्था तक
क्या आक्रामक राजनीति ने भारत की आर्थिक और वैश्विक छवि को नुकसान पहुँचाया?
कोविड महामारी के दौरान "आपदा में अवसर" का नारा दिया गया था। उस समय इसका आशय संकट को नवाचार, आत्मनिर्भरता और आर्थिक पुनर्निर्माण के अवसर में बदलने से था। लेकिन समय बीतने के साथ यह नारा एक व्यापक राजनीतिक और आर्थिक बहस का विषय बन गया। आलोचकों का तर्क है कि अवसर की खोज में सरकार ने संकटों को विकास के साधन के रूप में देखना शुरू कर दिया, जबकि वास्तविकता में अनेक नीतियाँ अर्थव्यवस्था को और अधिक अस्थिरता की ओर ले गईं।
भारत आज एक विरोधाभास के दौर से गुजर रहा है। एक ओर वह विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, दूसरी ओर बेरोज़गारी, आय असमानता, निवेश की सुस्ती और उपभोग में गिरावट जैसी चुनौतियाँ भी मौजूद हैं। आर्थिक शक्ति का दावा और आम नागरिक की आर्थिक चिंता के बीच की दूरी लगातार चर्चा का विषय बनती जा रही है।
इस स्थिति का एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय आयाम भी है। आधुनिक विश्व में व्यापार केवल वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान नहीं रह गया है। निवेश, तकनीक, पूँजी और वैश्विक साझेदारियाँ राजनीतिक वातावरण से भी प्रभावित होती हैं। लोकतांत्रिक देशों का एक बड़ा वर्ग स्थिरता, संस्थागत पारदर्शिता और पूर्वानुमेय नीतियों को प्राथमिकता देता है।
यहीं पर शासन की शैली महत्वपूर्ण हो जाती है।
यदि किसी देश की छवि अत्यधिक आक्रामक, ध्रुवीकृत या टकराववादी बनती है, तो निवेशक और साझेदार अधिक सावधानी बरतने लगते हैं। वैश्विक व्यापार केवल शक्ति से नहीं चलता, विश्वास से भी चलता है। पूँजी वहाँ जाती है जहाँ उसे स्थिरता, कानून का शासन और संस्थागत भरोसा दिखाई देता है।
इसीलिए कहा जाता है कि आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था में लोकतंत्र केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि आर्थिक नीति का भी एक महत्वपूर्ण आधार है। भले ही कई बार लोकतंत्र औपचारिक या अपूर्ण दिखाई दे, फिर भी निवेशक स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र मीडिया, उत्तरदायी संस्थाओं और नीति-निरंतरता को महत्व देते हैं।
आक्रामक राष्ट्रवाद अल्पकाल में राजनीतिक लाभ दे सकता है, लेकिन दीर्घकाल में अर्थव्यवस्था को स्थिर विकास के लिए सहयोग, संवाद और विश्वास की आवश्यकता होती है। दुनिया के अधिकांश विकसित लोकतंत्र अपनी प्रतिस्पर्धा के बावजूद आर्थिक सहयोग को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि वैश्विक व्यापार का आधार युद्ध नहीं, परस्पर निर्भरता है।
भारत के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह शक्ति और लोकतंत्र, राष्ट्रवाद और उदारता, आत्मनिर्भरता और वैश्विक साझेदारी के बीच संतुलन स्थापित करे। आर्थिक महाशक्ति बनने का मार्ग केवल बड़े नारों से नहीं, बल्कि मजबूत संस्थाओं, सामाजिक विश्वास, लोकतांत्रिक विश्वसनीयता और दीर्घकालिक नीति-स्थिरता से होकर गुजरता है।
यदि लोकतंत्र कमजोर पड़ता है, तो अर्थव्यवस्था भी अंततः उसकी कीमत चुकाती है। और यदि लोकतंत्र मजबूत होता है, तो वही किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी आर्थिक पूँजी बन जाता है।









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