होर्मुज नहीं, बाब-अल-मंडेब से दुनिया को घेरने की तैयारी में ईरान?

पश्चिम एशिया का नया दांव और वैश्विक ऊर्जा युद्ध की आहट पश्चिम एशिया का संकट अब केवल ईरान, अमेरिका और इजरायल तक सीमित नहीं रह गया है। यदि हालिया घटनाक्रम सही दिशा में बढ़ते हैं तो दुनिया एक ऐसे ऊर्जा संकट का सामना कर सकती है जो केवल तेल की कीमतें नहीं बढ़ाएगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कनों को भी प्रभावित करेगा। ईरान द्वारा अमेरिका के साथ अप्रत्यक्ष वार्ता रोकने और बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ती चर्चाओं ने इस आशंका को जन्म दिया है कि तेहरान अब होर्मुज से भी अधिक खतरनाक रणनीति पर विचार कर सकता है। होर्मुज की जगह बाब-अल-मंडेब क्यों? दुनिया की निगाहें हमेशा से Strait of Hormuz पर रहती हैं क्योंकि वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा यहीं से गुजरता है। लेकिन समस्या यह है कि होर्मुज पर किसी भी बड़े कदम का सीधा सैन्य जवाब अमेरिका और उसके सहयोगी दे सकते हैं। इसके विपरीत Bab-el-Mandeb एक ऐसा चोकपॉइंट है जहाँ ईरान सीधे नहीं बल्कि अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के माध्यम से दबाव बना सकता है। यही वजह है कि रणनीतिक विशेषज्ञ इसे "ईरान का अप्रत्यक्ष हथियार" मानते हैं। बाब-अल-मंडेब का महत्व लाल सागर और अदन की खाड़ी को जोड़ने वाला यह संकरा जलमार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में गिना जाता है। यूरोप, एशिया और मध्य पूर्व के बीच व्यापार का बड़ा हिस्सा यहीं से होकर गुजरता है। यदि यह मार्ग बाधित होता है तो— स्वेज नहर का महत्व प्रभावित होगा, यूरोप को तेल और गैस आपूर्ति बाधित होगी, एशियाई निर्यात महंगे होंगे, वैश्विक शिपिंग लागत बढ़ेगी, और ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल आ सकता है। हूती : ईरान की सामरिक ढाल Houthi Movement पिछले कुछ वर्षों में यह साबित कर चुका है कि वह लाल सागर में अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। यमन के पश्चिमी तट पर उसकी मौजूदगी बाब-अल-मंडेब को रणनीतिक महत्व प्रदान करती है। यदि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ता है तो हूती विद्रोही जहाजों पर हमले, ड्रोन अभियान या मिसाइल हमलों के माध्यम से वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर सकते हैं। यही कारण है कि बाब-अल-मंडेब को कई विश्लेषक "ईरान का दूसरा होर्मुज" कहते हैं। अमेरिका की मुश्किल अमेरिका के लिए यह स्थिति जटिल है। यदि होर्मुज में संकट होता है तो वह सीधे प्रतिक्रिया दे सकता है। लेकिन बाब-अल-मंडेब में स्थिति अलग है। यहाँ संघर्ष— यमन, हूती, इजरायल, लाल सागर, और अफ्रीकी तटों के बीच फैला हुआ है। अर्थात अमेरिका को एक साथ कई मोर्चों पर सक्रिय होना पड़ सकता है। ऊर्जा संकट की आशंका यदि होर्मुज और बाब-अल-मंडेब दोनों पर दबाव बनता है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में अभूतपूर्व स्थिति पैदा हो सकती है। यूरोप पहले से ऊर्जा सुरक्षा को लेकर संवेदनशील है। एशिया के बड़े आयातक देश— भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, चीन भी प्रभावित होंगे। ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का असर खाद्य पदार्थों, परिवहन और औद्योगिक उत्पादन तक दिखाई देगा। भारत के लिए खतरा India अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है। भारत का पश्चिम एशिया और यूरोप के साथ व्यापार भी समुद्री मार्गों पर निर्भर है। यदि बाब-अल-मंडेब में संकट गहराता है तो— आयात लागत बढ़ेगी, माल ढुलाई महंगी होगी, ऊर्जा बिल बढ़ेगा, और मुद्रास्फीति पर दबाव आएगा। यही कारण है कि भारत पश्चिम एशिया में स्थिरता का सबसे बड़ा समर्थक है। क्या यह युद्ध का नया स्वरूप है? 21वीं सदी के युद्ध केवल टैंकों और मिसाइलों से नहीं लड़े जा रहे। आज चोकपॉइंट, समुद्री मार्ग, रेयर अर्थ मिनरल, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ युद्ध के नए हथियार बन चुके हैं। ईरान समझता है कि वह अमेरिका से पारंपरिक सैन्य शक्ति में प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता, लेकिन वैश्विक ऊर्जा और व्यापार मार्गों को प्रभावित करके वह कहीं अधिक व्यापक दबाव बना सकता है। निष्कर्ष यदि अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता वास्तव में ठहराव का शिकार हो जाती है और क्षेत्रीय तनाव बढ़ता है, तो बाब-अल -मंडेब जलडमरूमध्य अगला बड़ा भू-राजनीतिक मोर्चा बन सकता है। होर्मुज की तरह यह केवल एक समुद्री मार्ग नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की धमनियों में से एक है। आज दुनिया जिस संकट का सामना कर रही है, वह हमें एक नई सच्चाई बताता है—आधुनिक युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि समुद्री चोकपॉइंट, ऊर्जा मार्गों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर भी लड़े जाते हैं। यदि बाब-अल-मंडेब में अस्थिरता बढ़ती है तो उसका प्रभाव तेहरान, तेल अवीव या वॉशिंगटन तक सीमित नहीं रहेगा; इसकी गूंज नई दिल्ली, टोक्यो, बीजिंग, बर्लिन और लंदन तक सुनाई देगी। यही कारण है कि पश्चिम एशिया का यह संकरा जलमार्ग आने वाले दिनों में विश्व राजनीति का सबसे संवेदनशील बिंदु बन सकता है।

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