क्या जापान के सहारे चीन को घेर रहा है अमेरिका?
क्वाड में भारत की भूमिका पर उठते सवाल
इंडो-पैसिफिक की बदलती भू-राजनीति का विश्लेषण
21वीं सदी की विश्व राजनीति का केंद्र अब यूरोप नहीं, बल्कि एशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र बनता जा रहा है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं, सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्ग और सबसे संवेदनशील सामरिक प्रतिस्पर्धाएं इसी क्षेत्र में मौजूद हैं। इस नई शक्ति-संरचना के केंद्र में तीन देश हैं—अमेरिका, चीन और भारत। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक चौथा खिलाड़ी तेजी से उभरता दिखाई दे रहा है—जापान।
जापान का सैन्य पुनरुत्थान केवल टोक्यो की सुरक्षा नीति में बदलाव नहीं है। यह एशिया की शक्ति-संरचना में एक गहरा परिवर्तन है। इसी संदर्भ में यह प्रश्न उठने लगा है कि क्या अमेरिका चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए जापान पर अधिक भरोसा करने लगा है? क्या क्वाड में भारत की भूमिका पहले जैसी महत्वपूर्ण नहीं रह गई है? और क्या इंडो-पैसिफिक रणनीति में जापान अमेरिका का नया पसंदीदा साझेदार बन रहा है?
इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए हमें इंडो-पैसिफिक की बदलती राजनीति को समझना होगा।
चीन का उदय और अमेरिकी चिंता
शीत युद्ध की समाप्ति के बाद अमेरिका दुनिया की एकमात्र महाशक्ति बनकर उभरा था। लेकिन 21वीं सदी के पहले दो दशकों में चीन ने अभूतपूर्व आर्थिक और सैन्य प्रगति की।
आज चीन:
विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना का दावा करता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता, 5G और उन्नत विनिर्माण में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
दक्षिण चीन सागर से लेकर हिंद महासागर तक अपना प्रभाव बढ़ा रहा है।
अमेरिका के लिए यह केवल आर्थिक प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि वैश्विक नेतृत्व की चुनौती है।
इसी चुनौती के उत्तर में इंडो-पैसिफिक रणनीति का जन्म हुआ।
क्वाड का निर्माण क्यों हुआ?
क्वाड में भारत, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं।
इस मंच का मूल उद्देश्य किसी देश के विरुद्ध सैन्य गठबंधन बनाना नहीं था। लेकिन अधिकांश विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका मुख्य लक्ष्य एशिया में शक्ति संतुलन बनाए रखना है।
क्वाड का विचार पहली बार 2007 में सामने आया था, लेकिन चीन की बढ़ती शक्ति और आक्रामकता के कारण पिछले वर्षों में इसे नई ऊर्जा मिली।
क्वाड के चारों सदस्य लोकतांत्रिक देश हैं और समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता, नियम-आधारित व्यवस्था तथा क्षेत्रीय स्थिरता का समर्थन करते हैं।
जापान क्यों बन रहा है अमेरिका का प्रमुख साझेदार?
अमेरिका और जापान के संबंध भारत-अमेरिका संबंधों से कहीं अधिक पुराने हैं।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद:
जापान में अमेरिकी सैन्य अड्डे स्थापित हुए।
दोनों देशों के बीच सुरक्षा संधि बनी।
जापान अमेरिका की एशिया नीति का केंद्रीय स्तंभ बन गया।
आज भी जापान में हजारों अमेरिकी सैनिक तैनात हैं।
इस दृष्टि से देखें तो जापान अमेरिका का सहयोगी है, जबकि भारत साझेदार है।
यही अंतर दोनों देशों की भूमिका को अलग बनाता है।
जापान का सैन्य पुनर्जागरण
दशकों तक जापान ने अपनी सैन्य भूमिका सीमित रखी।
लेकिन चीन की बढ़ती शक्ति और उत्तर कोरिया की मिसाइल क्षमताओं ने जापान को अपनी रणनीति बदलने के लिए प्रेरित किया।
आज जापान:
रक्षा बजट बढ़ा रहा है।
लंबी दूरी की मिसाइलें विकसित कर रहा है।
नौसैनिक शक्ति मजबूत कर रहा है।
साइबर और अंतरिक्ष सुरक्षा में निवेश कर रहा है।
कुछ विशेषज्ञ इसे द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जापान का सबसे बड़ा सामरिक परिवर्तन मानते हैं।
क्या अमेरिका जापान पर अधिक भरोसा करता है?
सैन्य दृष्टि से उत्तर है—हाँ।
कारण स्पष्ट हैं।
जापान:
अमेरिका का औपचारिक सुरक्षा सहयोगी है।
अमेरिकी सैन्य अड्डों की मेजबानी करता है।
संकट की स्थिति में अमेरिका के साथ सैन्य समन्वय कर सकता है।
भारत:
किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं है।
रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर देता है।
अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेता है।
इसलिए अमेरिका जापान को एक निश्चित सैन्य साझेदार के रूप में देखता है, जबकि भारत को एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में।
क्या भारत को किनारे किया जा रहा है?
यही सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि:
ताइवान संकट पर भारत अमेरिका जितना आक्रामक नहीं है।
रूस के साथ भारत के संबंध अमेरिका को असहज करते हैं।
भारत किसी सैन्य गठबंधन में शामिल नहीं होना चाहता।
इसलिए अमेरिका जापान और ऑस्ट्रेलिया पर अधिक निर्भर हो सकता है।
लेकिन यह निष्कर्ष पूरी तरह सही नहीं है।
भारत की अनिवार्यता
भारत को पूरी तरह किनारे करना अमेरिका के लिए संभव नहीं है।
कारण स्पष्ट हैं।
1. हिंद महासागर
भारत की भौगोलिक स्थिति अद्वितीय है।
हिंद महासागर के प्रमुख समुद्री मार्ग भारत के निकट से गुजरते हैं।
विश्व व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से होकर जाता है।
जापान इस भूमिका को नहीं निभा सकता।
2. जनसंख्या और बाजार
भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है।
आर्थिक दृष्टि से भी उसका महत्व तेजी से बढ़ रहा है।
अमेरिका के लिए भारत केवल सुरक्षा साझेदार नहीं बल्कि विशाल आर्थिक अवसर भी है।
3. चीन के लिए वास्तविक संतुलन
यदि चीन को दीर्घकाल में कोई शक्ति संतुलित कर सकती है तो वह केवल जापान नहीं है।
भारत:
विशाल जनसंख्या,
बड़ा भूभाग,
परमाणु शक्ति,
बढ़ती अर्थव्यवस्था
के कारण चीन के लिए दीर्घकालिक चुनौती है।
फिर जापान को बढ़ावा क्यों?
क्योंकि जापान तत्काल उपलब्ध सैन्य शक्ति है।
भारत अभी भी:
रक्षा आधुनिकीकरण,
विनिर्माण क्षमता,
तकनीकी आत्मनिर्भरता
के क्षेत्र में लंबी यात्रा तय कर रहा है।
इसके विपरीत जापान के पास पहले से उन्नत तकनीक और विकसित सैन्य अवसंरचना है।
इसलिए अमेरिका अल्पकाल में जापान और दीर्घकाल में भारत दोनों को महत्वपूर्ण मानता है।
क्वाड की सीमाएं
कई लोग क्वाड को एशियाई नाटो मानते हैं।
लेकिन यह धारणा सही नहीं है।
क्वाड:
कोई सामूहिक रक्षा संधि नहीं है।
इसमें सैन्य हस्तक्षेप का दायित्व नहीं है।
सदस्य देशों की विदेश नीतियां स्वतंत्र हैं।
यही कारण है कि भारत इसमें सहज महसूस करता है।
क्या अमेरिका क्वाड को कमजोर कर रहा है?
कुछ विश्लेषकों के अनुसार अमेरिका अब छोटे और अधिक सैन्य-केंद्रित समूहों पर ध्यान दे रहा है।
उदाहरण:
अमेरिका-जापान गठबंधन
अमेरिका-जापान-दक्षिण कोरिया सहयोग
AUKUS व्यवस्था
इन व्यवस्थाओं में सैन्य आयाम अधिक स्पष्ट हैं।
लेकिन इससे क्वाड अप्रासंगिक नहीं हो जाता।
क्वाड का उद्देश्य सैन्य गठबंधन बनना नहीं बल्कि व्यापक रणनीतिक सहयोग है।
जापान और भारत: प्रतिस्पर्धी नहीं, पूरक
अक्सर यह मान लिया जाता है कि यदि जापान का महत्व बढ़ेगा तो भारत का महत्व घटेगा।
वास्तव में स्थिति उलटी है।
जापान:
पूर्वी एशिया में महत्वपूर्ण है।
भारत:
हिंद महासागर में महत्वपूर्ण है।
दोनों मिलकर चीन के प्रभाव को संतुलित करने में अधिक सक्षम हैं।
भारत को क्या करना चाहिए?
यदि भारत वास्तव में इंडो-पैसिफिक में केंद्रीय भूमिका चाहता है तो उसे:
आर्थिक शक्ति बढ़ानी होगी
सैन्य शक्ति का आधार आर्थिक क्षमता होती है।
रक्षा उत्पादन बढ़ाना होगा
आयातक नहीं, निर्यातक बनना होगा।
नौसैनिक शक्ति का विस्तार करना होगा
हिंद महासागर में नेतृत्व तभी संभव है।
तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ानी होगी
कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में प्रगति आवश्यक है।
क्या जापान भारत का विकल्प बन सकता है?
नहीं।
जापान और भारत की भूमिकाएं अलग हैं।
जापान:
पूर्वी चीन सागर,
ताइवान,
पश्चिमी प्रशांत
के लिए महत्वपूर्ण है।
भारत:
हिंद महासागर,
पश्चिम एशिया,
अफ्रीका
के लिए महत्वपूर्ण है।
अमेरिका दोनों में से किसी एक को चुनने की स्थिति में नहीं है।
उसे दोनों की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि अमेरिका ने चीन को घेरने के लिए जापान पर दांव लगाकर भारत को किनारे कर दिया है। वास्तविकता यह है कि अमेरिका एशिया में बहुस्तरीय रणनीति अपना रहा है। जापान उसकी अग्रिम सैन्य चौकी है, जबकि भारत हिंद महासागर और दक्षिण एशिया में उसका सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है।
हाँ, यह सत्य है कि जापान का महत्व बढ़ा है। लेकिन यह भारत के महत्व में कमी का संकेत नहीं, बल्कि एशिया में शक्ति संतुलन की नई संरचना का हिस्सा है।
भारत के सामने चुनौती अमेरिका की प्राथमिकताओं को लेकर चिंतित होने की नहीं, बल्कि अपनी आर्थिक, तकनीकी और सैन्य क्षमता को इतना मजबूत बनाने की है कि कोई भी वैश्विक शक्ति उसे नजरअंदाज न कर सके।
भू-राजनीति में सम्मान मित्रता से नहीं, सामर्थ्य से मिलता है। और 21वीं सदी के एशिया में भारत की वास्तविक भूमिका भी अंततः उसकी अपनी शक्ति से ही तय होगी।










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