यूपीएससी परीक्षा पैटर्न में क्लर्क बनने की संभावना अधिक, प्रशासक बनने की कम?

भारत में Union Public Service Commission की सिविल सेवा परीक्षा को देश की सबसे प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षा माना जाता है। इसका घोषित उद्देश्य ऐसे प्रतिभाशाली युवाओं का चयन करना है जो भविष्य में देश के सक्षम प्रशासक, नीति-निर्माता और नेतृत्वकर्ता बन सकें। किंतु समय-समय पर यह आलोचना भी उठती रही है कि वर्तमान परीक्षा प्रणाली वास्तविक प्रशासकों की अपेक्षा अधिकतर ऐसे अभ्यर्थियों का चयन करती है जो नियमों, तथ्यों और सूचनाओं को याद रखने में दक्ष होते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो यह व्यवस्था "प्रशासक" से अधिक "क्लर्कीय मानसिकता" वाले अधिकारियों को जन्म देती है। परीक्षा का स्वरूप और उसकी सीमाएँ यूपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा वस्तुनिष्ठ प्रश्नों पर आधारित है। इसमें तथ्यों, आंकड़ों, रिपोर्टों, योजनाओं, भूगोल, इतिहास और समसामयिक घटनाओं का विशाल भंडार याद रखना पड़ता है। मुख्य परीक्षा में भी उत्तर लेखन का बड़ा भाग तथ्यों और पूर्वनिर्धारित ढाँचों पर निर्भर रहता है। निश्चित रूप से सामान्य ज्ञान किसी भी प्रशासक के लिए आवश्यक है, परंतु केवल ज्ञान ही प्रशासनिक क्षमता का पर्याय नहीं है। एक सफल प्रशासक में निर्णय लेने की क्षमता, संकट प्रबंधन, नेतृत्व, मानवीय संवेदनशीलता, जोखिम उठाने का साहस तथा नवाचार की प्रवृत्ति भी होनी चाहिए। इन गुणों की परीक्षा लिखित प्रश्नपत्रों द्वारा सीमित रूप से ही संभव है। स्मरण शक्ति बनाम नेतृत्व क्षमता वर्तमान प्रणाली में सफलता का बड़ा आधार तथ्यों को याद रखने और निर्धारित प्रारूप में उत्तर लिखने की क्षमता है। लाखों अभ्यर्थी वर्षों तक कोचिंग संस्थानों के नोट्स, टेस्ट सीरीज़ और मॉडल उत्तरों के सहारे तैयारी करते हैं। परिणामस्वरूप चयनित उम्मीदवार अक्सर परीक्षा की तकनीक में तो निपुण होते हैं, परंतु यह आवश्यक नहीं कि उनमें प्रशासनिक नेतृत्व के गुण भी समान स्तर पर हों। एक जिला अधिकारी को बाढ़, महामारी, दंगे, दुर्घटना या आर्थिक संकट जैसी परिस्थितियों में त्वरित निर्णय लेने पड़ते हैं। वहाँ पुस्तकीय ज्ञान से अधिक व्यावहारिक बुद्धिमत्ता और नेतृत्व क्षमता की आवश्यकता होती है। परीक्षा इन गुणों का आकलन बहुत सीमित रूप से कर पाती है। कोचिंग संस्कृति का प्रभाव दिल्ली के मुखर्जी नगर और राजस्थान के कोटा जैसे केंद्रों ने यूपीएससी तैयारी को एक उद्योग का रूप दे दिया है। कोचिंग संस्थान यह सिखाते हैं कि उत्तर कैसे लिखा जाए, किस प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया जाए और परीक्षक को क्या पसंद आएगा। इस प्रक्रिया में मौलिक चिंतन और स्वतंत्र दृष्टिकोण अक्सर पीछे छूट जाते हैं। अभ्यर्थी जोखिम लेने के बजाय "सुरक्षित उत्तर" लिखना सीख जाते हैं। यही मानसिकता बाद में प्रशासनिक सेवा में भी दिखाई दे सकती है, जहाँ अधिकारी नियमों का पालन तो करते हैं लेकिन नवाचार और पहल से बचते हैं। प्रशासन में बढ़ती फाइल संस्कृति भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की एक प्रमुख आलोचना यह रही है कि कई अधिकारी निर्णय लेने के बजाय फाइलों को आगे बढ़ाने में अधिक सहज महसूस करते हैं। निर्णय की जिम्मेदारी लेने से बचने की प्रवृत्ति विकसित हो जाती है। यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि इसका कारण केवल यूपीएससी है, लेकिन चयन प्रक्रिया का प्रभाव अवश्य पड़ता है। जब परीक्षा प्रणाली जोखिम-मुक्त और पूर्वनिर्धारित उत्तरों को पुरस्कृत करती है, तब स्वाभाविक रूप से वैसी ही मानसिकता वाले उम्मीदवार अधिक सफल होते हैं। क्या साक्षात्कार पर्याप्त है? यूपीएससी का व्यक्तित्व परीक्षण (इंटरव्यू) उम्मीदवार की प्रशासनिक क्षमता का आकलन करने का प्रयास करता है। लेकिन लगभग 20–30 मिनट के साक्षात्कार में किसी व्यक्ति के नेतृत्व, नैतिक साहस और संकट प्रबंधन कौशल का पूर्ण मूल्यांकन कठिन है। अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि समूह चर्चा, परिस्थितिजन्य परीक्षण (Situational Judgment Tests), मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन तथा नेतृत्व आधारित अभ्यासों को चयन प्रक्रिया में अधिक महत्व दिया जाना चाहिए। सुधार की आवश्यकता यदि वास्तव में भविष्य के प्रशासकों का चयन करना है, तो परीक्षा प्रणाली में कुछ महत्वपूर्ण बदलावों पर विचार किया जा सकता है— तथ्यात्मक प्रश्नों का अनुपात कम किया जाए। समस्या समाधान आधारित प्रश्न बढ़ाए जाएँ। नेतृत्व और निर्णय क्षमता के परीक्षण शामिल हों। मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन को महत्व दिया जाए। प्रशासनिक प्रशिक्षण के दौरान भी निरंतर मूल्यांकन हो। नवाचार और व्यावहारिक अनुभव को अतिरिक्त महत्व दिया जाए। निष्कर्ष यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि यूपीएससी केवल क्लर्क पैदा करती है। इसी प्रणाली से अनेक उत्कृष्ट अधिकारी भी निकले हैं जिन्होंने प्रशासन में उल्लेखनीय परिवर्तन किए हैं। किंतु यह भी सत्य है कि वर्तमान परीक्षा पैटर्न स्मरण शक्ति, उत्तर लेखन कौशल और परीक्षा तकनीक को अपेक्षाकृत अधिक पुरस्कृत करता है, जबकि नेतृत्व, जोखिम उठाने की क्षमता और प्रशासनिक नवाचार जैसे गुणों का मूल्यांकन सीमित रह जाता है। इसलिए आलोचना का सार यह है कि वर्तमान व्यवस्था में "कुशल परीक्षार्थी" बनने की संभावना "कुशल प्रशासक" बनने की संभावना से अधिक दिखाई देती है। यदि भारत को 21वीं सदी की चुनौतियों के अनुरूप प्रशासनिक नेतृत्व चाहिए, तो चयन प्रक्रिया को केवल ज्ञान-परीक्षण से आगे बढ़ाकर वास्तविक नेतृत्व और निर्णय क्षमता की परीक्षा बनाना होगा।

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