ईरान हर शांति समझौते के बाद अमेरिका को और कमजोर कर रहा है: क्या टूट रहा है विश्व शक्ति का गुरूर?
बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक से लेकर इक्कीसवीं शताब्दी के पहले दो दशकों तक अमेरिका को निर्विवाद वैश्विक महाशक्ति माना जाता था। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद ऐसा लगा कि विश्व व्यवस्था अब अमेरिकी नेतृत्व में ही संचालित होगी। लेकिन पश्चिम एशिया में हुए लंबे युद्धों, बदलते गठबंधनों, चीन के उदय, रूस की वापसी और ईरान की दीर्घकालिक रणनीति ने इस धारणा को चुनौती दी है।
ईरान के साथ होने वाले हर संघर्ष और उसके बाद बनने वाले किसी भी युद्धविराम या समझौते के बाद यह प्रश्न अधिक तीखा होकर सामने आता है—क्या अमेरिका वास्तव में कमजोर हो रहा है, या केवल उसकी शक्ति का उपयोग करने का तरीका बदल रहा है?
पश्चिम एशिया में अमेरिकी शक्ति का इतिहास
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने पश्चिम एशिया में तीन प्रमुख उद्देश्यों के आधार पर अपनी नीति बनाई—
तेल संसाधनों की सुरक्षा।
इज़राइल की सुरक्षा।
सोवियत संघ तथा बाद में रूस और चीन के प्रभाव को सीमित करना।
इसी कारण अमेरिका ने सऊदी अरब, खाड़ी देशों और इज़राइल के साथ गहरे रणनीतिक संबंध बनाए। 1991 के खाड़ी युद्ध में इराक की पराजय ने अमेरिकी सैन्य श्रेष्ठता का ऐसा प्रदर्शन किया कि पूरी दुनिया उसकी शक्ति से प्रभावित हुई।
लेकिन यही आत्मविश्वास आगे चलकर अति-आत्मविश्वास में बदल गया।
इराक, अफ़ग़ानिस्तान और ईरान: तीन अलग रणनीतियाँ
इराक
2003 में सद्दाम हुसैन की सरकार कुछ ही सप्ताह में गिर गई। सैन्य विजय तेज थी, लेकिन उसके बाद वर्षों तक गृहयुद्ध, आतंकवाद और राजनीतिक अस्थिरता बनी रही।
अफ़ग़ानिस्तान
20 वर्षों तक अमेरिका ने विशाल सैन्य और आर्थिक संसाधन लगाए। अंततः 2021 में अमेरिकी वापसी के साथ वही शासन वापस आ गया जिसे हटाने के लिए युद्ध शुरू किया गया था।
ईरान
ईरान ने प्रत्यक्ष युद्ध से बचते हुए प्रॉक्सी नेटवर्क, मिसाइल कार्यक्रम, क्षेत्रीय सहयोगियों और कूटनीति का सहारा लिया। अमेरिका ने प्रतिबंध लगाए, लेकिन ईरान की राजनीतिक व्यवस्था बनी रही।
यहीं सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है। इराक और अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका ने प्रत्यक्ष युद्ध लड़ा, जबकि ईरान ने प्रत्यक्ष टकराव से बचते हुए दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा अपनाई।
क्यों सैन्य सफलता राजनीतिक सफलता नहीं बनती?
आधुनिक युद्ध केवल टैंक, विमान और मिसाइल से नहीं जीते जाते।
राजनीतिक वैधता, स्थानीय समर्थन, आर्थिक स्थिरता और दीर्घकालिक शासन-व्यवस्था कहीं अधिक महत्वपूर्ण बन चुके हैं।
अमेरिका युद्ध जीत सकता है, लेकिन यदि स्थायी राजनीतिक व्यवस्था स्थापित नहीं होती, तो सैन्य विजय का प्रभाव धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।
इराक और अफ़ग़ानिस्तान इसका प्रमुख उदाहरण हैं।
ईरान की "Strategic Patience" नीति
ईरान ने वर्षों से "रणनीतिक धैर्य" अपनाया है।
इस नीति की प्रमुख विशेषताएँ हैं—
प्रत्यक्ष युद्ध से बचना।
समय को अपने पक्ष में काम करने देना।
आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद व्यवस्था बनाए रखना।
प्रॉक्सी संगठनों के माध्यम से प्रभाव बढ़ाना।
परमाणु कार्यक्रम को वार्ता के साधन के रूप में उपयोग करना।
विरोधी को लंबे समय तक आर्थिक और राजनीतिक रूप से थकाना।
ईरान समझता है कि अमेरिका लोकतांत्रिक राजनीति के कारण लंबे युद्धों में घरेलू दबाव झेलता है।
इज़राइल–ईरान तनाव और अमेरिकी भूमिका
इज़राइल ईरान को अपनी सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती मानता है।
अमेरिका लगातार इज़राइल की सुरक्षा का समर्थन करता है, लेकिन हर बार प्रत्यक्ष युद्ध में उतरना उसके लिए आसान नहीं है।
यही कारण है कि अमेरिका को संतुलन बनाना पड़ता है—
इज़राइल की सुरक्षा।
खाड़ी देशों की स्थिरता।
वैश्विक तेल बाज़ार।
घरेलू राजनीतिक दबाव।
चीन और रूस के साथ व्यापक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा।
इस कारण अमेरिकी निर्णय पहले की तुलना में अधिक सावधान दिखाई देते हैं।
चीन और रूस से बदलता शक्ति संतुलन
आज ईरान अकेला नहीं है।
चीन उसके लिए महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार है।
रूस रक्षा, ऊर्जा और क्षेत्रीय रणनीति में सहयोग बढ़ा रहा है।
इस त्रिकोण ने अमेरिकी प्रतिबंधों की प्रभावशीलता कुछ हद तक कम की है।
हालाँकि यह कहना भी उचित नहीं होगा कि चीन और रूस हर परिस्थिति में ईरान का बिना शर्त समर्थन करते हैं। दोनों अपने-अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार सीमित और व्यावहारिक सहयोग करते हैं।
क्या अमेरिकी Deterrence कमजोर हुई है?
प्रतिरोधक क्षमता (Deterrence) का अर्थ है—दुश्मन इतना भयभीत रहे कि हमला करने से पहले कई बार सोचे।
कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि—
अफ़ग़ानिस्तान से वापसी,
लंबे युद्धों से बचने की प्रवृत्ति,
और सीमित सैन्य प्रतिक्रिया
ने अमेरिकी प्रतिरोधक क्षमता की धारणा को प्रभावित किया है।
दूसरी ओर, अमेरिका अभी भी—
विश्व का सबसे बड़ा रक्षा बजट रखता है,
विशाल नौसैनिक शक्ति रखता है,
उन्नत तकनीकी बढ़त बनाए हुए है,
और व्यापक सैन्य गठबंधनों का नेतृत्व करता है।
इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि Deterrence समाप्त नहीं हुई, बल्कि उसका स्वरूप बदल रहा है।
ट्रंप और बाइडेन की पश्चिम एशिया नीति
Donald Trump
"Maximum Pressure" नीति।
ईरान परमाणु समझौते से बाहर निकलना।
कठोर आर्थिक प्रतिबंध।
Qasem Soleimani की हत्या।
अरब–इज़राइल संबंधों को सामान्य बनाने पर बल।
Joe Biden
कूटनीति पर अपेक्षाकृत अधिक जोर।
परमाणु समझौते को पुनर्जीवित करने का प्रयास।
बड़े युद्धों से बचने की कोशिश।
क्षेत्रीय तनाव को नियंत्रित रखने की नीति।
दोनों प्रशासन ईरान को चुनौती मानते रहे, लेकिन उनके साधन अलग रहे।
क्या दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है?
आज के संकेत बताते हैं कि विश्व केवल अमेरिका-केंद्रित नहीं रह गया है।
अब प्रमुख शक्ति केंद्र हैं—
अमेरिका
चीन
रूस
यूरोपीय संघ
भारत
क्षेत्रीय शक्तियाँ जैसे तुर्किये, सऊदी अरब और ईरान
हालाँकि अमेरिका अभी भी सैन्य, तकनीकी, वित्तीय और वैश्विक संस्थागत प्रभाव के मामले में सबसे प्रभावशाली देशों में बना हुआ है। इसलिए वर्तमान स्थिति को "पूर्ण बहुध्रुवीयता" के बजाय "संक्रमणकालीन बहुध्रुवीयता" कहना अधिक सटीक होगा।
भारत के लिए रणनीतिक सबक
भारत के सामने सबसे महत्वपूर्ण सीखें हैं—
किसी एक महाशक्ति पर अत्यधिक निर्भरता से बचना।
रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना।
ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण।
रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता।
समुद्री सुरक्षा मजबूत करना।
पश्चिम एशिया, अमेरिका, रूस और यूरोप—सभी के साथ संतुलित संबंध रखना।
उभरती प्रौद्योगिकियों और आर्थिक प्रतिस्पर्धा में निवेश बढ़ाना।
भारत की विदेश नीति का सबसे बड़ा आधार यही होना चाहिए कि बदलती विश्व व्यवस्था में वह किसी गुट का अनुयायी नहीं, बल्कि स्वतंत्र शक्ति के रूप में अपनी भूमिका निभाए।
निष्कर्ष: क्या वास्तव में "विश्व शक्ति का गुरूर" टूट रहा है?
यदि केवल इस आधार पर निष्कर्ष निकाला जाए कि ईरान हर संकट के बाद बना रहता है, तो यह कहना आकर्षक लग सकता है कि अमेरिका का "गुरूर" टूट रहा है। किंतु व्यापक विश्लेषण अधिक संतुलित तस्वीर प्रस्तुत करता है।
अमेरिका की सैन्य, आर्थिक, तकनीकी और वैश्विक गठबंधन-आधारित शक्ति अब भी अत्यंत व्यापक है। दूसरी ओर, ईरान ने सीमित संसाधनों के बावजूद धैर्य, प्रॉक्सी नेटवर्क, मिसाइल क्षमता और कूटनीतिक लचीलेपन के सहारे यह दिखाया है कि किसी महाशक्ति को केवल सैन्य बल से अपनी राजनीतिक इच्छानुसार परिणाम प्राप्त नहीं होते।
इसलिए वास्तविक परिवर्तन "अमेरिका के पतन" से अधिक शक्ति की प्रकृति में बदलाव का है। आज प्रभाव केवल सेना से नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, तकनीक, आपूर्ति शृंखलाओं, ऊर्जा, सूचना, कूटनीति और दीर्घकालिक रणनीतिक धैर्य से भी निर्धारित होता है।
अतः यह कहना अधिक सटीक होगा कि विश्व शक्ति का गुरूर पूरी तरह नहीं टूटा है; बल्कि एकध्रुवीय युग का आत्मविश्वास धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था में बदल रहा है जहाँ अनेक शक्तियाँ अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभाव डाल रही हैं। यही परिवर्तन इक्कीसवीं सदी की अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता बनता जा रहा है।









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