संघर्षविराम की सांसें उखड़ने लगीं : क्या ईरान-अमेरिका टकराव का दूसरा दौर शुरू होने वाला है?

पश्चिम एशिया में युद्ध की आग भले ही अप्रैल में घोषित संघर्षविराम के बाद कुछ समय के लिए धीमी पड़ गई हो, लेकिन अब फिर से बारूद की गंध तेज होने लगी है। ईरान द्वारा अमेरिका के साथ मध्यस्थों के जरिए चल रही अप्रत्यक्ष बातचीत को रोकने का निर्णय केवल एक कूटनीतिक कदम नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि क्षेत्र एक बार फिर बड़े सैन्य टकराव की ओर बढ़ सकता है। ईरान का आरोप है कि इजरायल लेबनान में लगातार हमले करके युद्धविराम का उल्लंघन कर रहा है और अमेरिका इस पर मौन समर्थन दे रहा है। तेहरान ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि लेबनान में युद्धविराम टूटा है तो वह पूरे क्षेत्र में संघर्षविराम टूटने के समान माना जाएगा। यह बयान केवल नाराजगी नहीं, बल्कि भविष्य की रणनीति का संकेत भी है। इजरायल के खिलाफ गुस्सा, अमेरिका को संदेश ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची का बयान इस संकट का केंद्र है। उनका कहना है कि युद्धविराम केवल ईरान और अमेरिका के बीच नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए था। यदि इजरायल लेबनान में हमले जारी रखता है तो ईरान अमेरिका को भी उसके परिणामों का जिम्मेदार मानेगा। यही वह बिंदु है जहां संघर्षविराम की बुनियाद कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। ईरान की नजर में अमेरिका और इजरायल अलग-अलग पक्ष नहीं बल्कि एक संयुक्त रणनीतिक मोर्चा हैं। होर्मुज का खतरा फिर मंडराया दुनिया के लिए सबसे बड़ी चिंता केवल युद्ध नहीं है, बल्कि होर्मुज जलडमरूमध्य है। विश्व के ऊर्जा व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। यदि ईरान वास्तव में फिर से होर्मुज में कड़ाई या अवरोध की नीति अपनाता है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मच सकती है। तेल की कीमतों में उछाल, आपूर्ति संकट और वैश्विक महंगाई की नई लहर पैदा हो सकती है। यानी यह केवल ईरान और अमेरिका का विवाद नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। क्या ट्रंप फिर सैन्य विकल्प चुनेंगे? अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump पहले ही कई बार संकेत दे चुके हैं कि यदि बातचीत विफल होती है तो सैन्य कार्रवाई का विकल्प खुला है। दूसरी ओर ईरान भी लगातार यह संदेश दे रहा है कि वह किसी भी नए संघर्ष के लिए तैयार है। ऐसे में वार्ता रुकने का अर्थ केवल कूटनीतिक गतिरोध नहीं बल्कि सैन्य विकल्पों के लिए रास्ता खुलना भी है। पाकिस्तान की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण हो गई? दिलचस्प तथ्य यह है कि हाल के महीनों में पाकिस्तान संवाद के एक संभावित माध्यम के रूप में उभरा था। लेकिन यदि वार्ता का यह चैनल भी बंद हो जाता है तो दोनों पक्षों के बीच गलतफहमी और अविश्वास बढ़ सकता है। इतिहास बताता है कि जब संवाद के रास्ते बंद होते हैं तो युद्ध की संभावना बढ़ जाती है। क्या यह युद्ध का विराम था या युद्ध के बीच का अंतराल? 8 अप्रैल का संघर्षविराम शुरू से ही स्थायी शांति समझौता नहीं था। यह केवल युद्ध की तीव्रता कम करने का एक अस्थायी प्रयास था। मूल विवाद अभी भी जस के तस हैं— ईरान का परमाणु कार्यक्रम इजरायल की सुरक्षा चिंताएं क्षेत्रीय प्रभाव की प्रतिस्पर्धा लेबनान और अन्य मोर्चों पर सक्रिय समूहों की भूमिका अमेरिका की पश्चिम एशिया नीति इनमें से किसी भी मुद्दे का स्थायी समाधान अभी तक सामने नहीं आया है। भारत के लिए इसका क्या अर्थ है? India के लिए यह संकट केवल विदेश नीति का विषय नहीं है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा, पश्चिम एशिया में काम कर रहे लाखों भारतीय, समुद्री व्यापार और वैश्विक तेल बाजार सीधे इस संकट से प्रभावित हो सकते हैं। यदि होर्मुज में तनाव बढ़ता है तो भारत के आयात बिल और आर्थिक स्थिरता पर दबाव बढ़ सकता है। यही कारण है कि भारत लगातार संवाद और कूटनीतिक समाधान का समर्थन करता रहा है। निष्कर्ष ईरान द्वारा अमेरिका के साथ अप्रत्यक्ष वार्ता रोकना एक साधारण कूटनीतिक घटना नहीं है। यह उस अविश्वास का प्रतीक है जो संघर्षविराम के बावजूद दोनों पक्षों के बीच बना हुआ है। यदि लेबनान में संघर्ष बढ़ता है, होर्मुज पर दबाव बढ़ता है और संवाद के रास्ते बंद होते हैं, तो पश्चिम एशिया एक बार फिर व्यापक संघर्ष की ओर बढ़ सकता है। संभव है कि आने वाले दिनों में दुनिया को यह तय करना पड़े कि अप्रैल का संघर्षविराम वास्तव में शांति की शुरुआत था या केवल अगले युद्ध से पहले का एक छोटा विराम।

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