क्या फिर लौट रहा है अमेरिका-चीन-पाकिस्तान समीकरण?
जी-7 की चमक के पीछे भारत की बदलती सामरिक स्थिति
जी-7 सम्मेलन में भारत की उपस्थिति को भले ही कूटनीतिक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रतीकों से अधिक महत्वपूर्ण संकेत होते हैं। प्रश्न यह है कि क्या विश्व व्यवस्था में भारत का वास्तविक प्रभाव बढ़ रहा है, या उसे केवल एक उपयोगी साझेदार के रूप में मंच पर बैठाया जा रहा है जबकि बड़े निर्णय कहीं और लिए जा रहे हैं?
हाल के वर्षों में भारत-अमेरिका संबंधों को अभूतपूर्व बताया गया। क्वाड, इंडो-पैसिफिक, रक्षा समझौते और चीन को संतुलित करने की साझा रणनीति को इस रिश्ते का आधार बनाया गया। लेकिन यदि हम घटनाओं को गहराई से देखें तो एक अलग तस्वीर भी उभरती है।
ट्रम्प और शी जिनपिंग के बीच व्यक्तिगत स्तर पर संवाद की इच्छा लगातार दिखाई देती रही है। ट्रम्प स्वयं कई बार कह चुके हैं कि वे चीन के साथ "बड़ा समझौता" करने में विश्वास रखते हैं। दूसरी ओर, अमेरिका के रणनीतिक समुदाय का एक वर्ग मानता है कि रूस को चीन से अलग करना अब संभव नहीं है, इसलिए चीन के साथ किसी प्रकार का शक्ति-संतुलन स्थापित करना ही व्यावहारिक विकल्प है।
यदि ऐसा होता है तो भारत की उपयोगिता स्वतः कम हो सकती है।
भारत को इंडो-पैसिफिक रणनीति में इसलिए महत्व मिला था क्योंकि वह चीन के विरुद्ध एक संभावित संतुलनकारी शक्ति था। लेकिन यदि वाशिंगटन और बीजिंग के बीच किसी नए समझौते की जमीन तैयार होती है, तो भारत का सामरिक मूल्य पहले जैसा नहीं रह जाएगा।
यहीं से एक और संभावना जन्म लेती है—क्या अमेरिका पुनः पाकिस्तान की ओर लौट सकता है?
शीत युद्ध के दौरान और उसके बाद लंबे समय तक अमेरिका, पाकिस्तान और चीन का एक प्रभावशाली रणनीतिक समीकरण रहा था। पाकिस्तान अमेरिका का सुरक्षा सहयोगी था और चीन का निकटतम क्षेत्रीय साझेदार। इस त्रिकोण ने दशकों तक दक्षिण एशिया की राजनीति को प्रभावित किया।
अफगानिस्तान युद्ध के बाद पाकिस्तान का महत्व कम हुआ, लेकिन वह पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। आज भी पाकिस्तान चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का केंद्र है, हिंद महासागर तक चीन की पहुँच का महत्वपूर्ण मार्ग है और इस्लामी दुनिया में अपनी अलग भूमिका रखता है।
यदि अमेरिका का प्राथमिक लक्ष्य चीन के साथ टकराव के बजाय समझौता बन जाता है, तो पाकिस्तान फिर से उपयोगी साझेदार के रूप में उभर सकता है।
भारत के लिए चिंता का विषय केवल अमेरिका नहीं है।
रूस, जो कभी भारत की विदेश नीति का सबसे स्थिर स्तंभ माना जाता था, अब पहले जैसी स्थिति में नहीं है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक रूप से चीन पर अधिक निर्भर हो गया है। परिणामस्वरूप उसकी विदेश नीति में भी चीन का प्रभाव बढ़ा है।
रूस आज खुलकर भारत-विरोधी नहीं है, लेकिन वह भारत-समर्थक भी पहले जैसा नहीं दिखता। चीन के साथ उसकी बढ़ती निकटता और पाकिस्तान के साथ बढ़ते सैन्य तथा ऊर्जा संबंध भारत के लिए संकेत हैं कि मॉस्को अब नई दिल्ली को प्राथमिक साझेदार के रूप में नहीं देखता।
इस प्रकार भारत एक विचित्र स्थिति में खड़ा दिखाई देता है।
अमेरिका उसे पूर्ण सहयोगी नहीं मानता।
रूस अब उसका विशेष संरक्षक नहीं रहा।
चीन उसे अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों में गिनता है।
और पाकिस्तान लगातार चीन के साथ अपनी सामरिक साझेदारी को मजबूत कर रहा है।
ऐसी स्थिति में केवल जी-7 के निमंत्रणों या औपचारिक स्वागत से संतुष्ट होना पर्याप्त नहीं होगा।
भारत को यह समझना होगा कि वैश्विक राजनीति में सम्मान और प्रभाव अलग-अलग चीजें हैं। सम्मान मंचों पर मिलता है, प्रभाव शक्ति-संतुलन में दिखाई देता है।
आज भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह स्वयं को किसी एक धुरी का परिशिष्ट बनने से बचाए। यदि वह केवल अमेरिका-केन्द्रित नीति अपनाता है, तो रूस और चीन दोनों उससे दूर होंगे। यदि वह रूस के साथ पुरानी निकटता बनाए रखने की कोशिश करता है, तो पश्चिम में संदेह बढ़ेगा।
इसलिए भारत के लिए एकमात्र व्यवहारिक विकल्प अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को पुनर्जीवित करना है।
अन्यथा यह संभव है कि आने वाले वर्षों में विश्व राजनीति का नया समीकरण अमेरिका-चीन संवाद, रूस-चीन साझेदारी और चीन-पाकिस्तान गठजोड़ के रूप में उभरे, जबकि भारत स्वयं को उन शक्ति-केन्द्रों के बाहर खड़ा पाए जिनके बीच वैश्विक व्यवस्था का पुनर्गठन हो रहा होगा।
जी-7 की तस्वीरों में भारत केंद्र में दिखाई दे सकता है, लेकिन इतिहास अंततः तस्वीरों से नहीं, शक्ति-संतुलन से लिखा जाता है।










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