क्या भारत में तेल की कीमतें वास्तव में वैश्विक बाजार से जुड़ी हैं
2014 से 2026 तक: विश्व बाजार में तेल का उतार-चढ़ाव और भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें
2014 में जब नई सरकार सत्ता में आई, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड का औसत मूल्य लगभग 99 डॉलर प्रति बैरल था। इसके बाद विश्व तेल बाजार ने असाधारण उतार-चढ़ाव देखे—2014-16 की गिरावट, कोविड काल की ऐतिहासिक मंदी, रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद उछाल और फिर 2025-26 में नरमी। इसके बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में वही अनुपातिक गिरावट नहीं दिखाई दी।
नीचे दिया गया तुलनात्मक चार्ट इस प्रवृत्ति को समझने में मदद करता है।
Global crude oil vs India petrol price trend (2014-2025)
Illustrative comparison using annual Brent crude averages and approximate Delhi petrol prices.
2018
Brent crude (USD/barrel)
71
India petrol (₹/litre approx.)
78
Brent crude (USD/barrel)
India petrol (₹/litre approx.)
25
50
75
100
125
2014
2015
2016
2017
2018
2019
2020
2021
2022
2023
2024
2025
नोट: ब्रेंट क्रूड के आँकड़े अंतरराष्ट्रीय औसत मूल्यों पर आधारित हैं। भारतीय पेट्रोल मूल्य विभिन्न वर्षों के औसत खुदरा स्तरों का संकेतात्मक प्रतिनिधित्व करते हैं।
2014: ऊँचे तेल मूल्य और नई आर्थिक परिस्थिति
2014 में ब्रेंट क्रूड का औसत मूल्य लगभग 99 डॉलर प्रति बैरल था। उस समय दिल्ली में पेट्रोल लगभग 70–73 रुपये प्रति लीटर के आसपास था। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का अधिकांश हिस्सा आयात करता था और आज भी करता है। इसलिए यह माना जाता था कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होगा तो भारत में भी ईंधन महंगा होगा।
लेकिन 2014 के उत्तरार्ध में एक बड़ा बदलाव आया। अमेरिका में शेल ऑयल उत्पादन बढ़ा, ओपेक देशों ने उत्पादन कम नहीं किया और वैश्विक मांग अपेक्षा से कमजोर रही। परिणामस्वरूप तेल की कीमतें तेजी से गिरने लगीं।
2015-16: दुनिया में तेल आधा, भारत में राहत सीमित
2015 में ब्रेंट क्रूड लगभग 52 डॉलर और 2016 में लगभग 44 डॉलर प्रति बैरल तक आ गया। यह लगभग 50 प्रतिशत की गिरावट थी।
यदि केवल कच्चे तेल की कीमत को आधार माना जाए तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी गिरावट दिखनी चाहिए थी। कुछ राहत मिली भी, लेकिन वह सीमित रही।
कारण यह था कि इसी अवधि में केंद्र सरकार ने उत्पाद शुल्क (Excise Duty) में कई बार वृद्धि की। सरकार का तर्क था कि कम तेल कीमतों का उपयोग राजकोषीय स्थिति मजबूत करने और विकास योजनाओं के वित्तपोषण के लिए किया जाना चाहिए।
यहीं से वह बहस शुरू हुई जो आज भी जारी है—क्या वैश्विक तेल कीमतों में गिरावट का पूरा लाभ उपभोक्ताओं तक पहुँचता है?
2017-19: धीरे-धीरे बढ़ता तेल, बढ़ती कीमतें
2017 से 2019 के बीच वैश्विक तेल बाजार में सुधार हुआ। ब्रेंट क्रूड 54 से 71 डॉलर के बीच पहुँचा। भारत में पेट्रोल की कीमतें भी बढ़ीं।
लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। जब तेल महंगा हुआ तो पेट्रोल तेजी से महंगा हुआ, लेकिन जब तेल सस्ता हुआ तो कीमतों में उतनी तेजी से कमी नहीं आई।
इस अंतर का बड़ा कारण कर संरचना थी। पेट्रोल और डीजल पर केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लगाए गए कर कुल कीमत का बड़ा हिस्सा बन चुके थे।
2020: इतिहास की सबसे बड़ी गिरावट
कोविड-19 महामारी के दौरान वैश्विक मांग अचानक गिर गई। विमान बंद हो गए, उद्योग रुक गए और परिवहन ठहर गया।
परिणामस्वरूप 2020 में ब्रेंट क्रूड का औसत मूल्य लगभग 42 डॉलर प्रति बैरल रह गया, जो पिछले कई वर्षों का न्यूनतम स्तर था।
सैद्धांतिक रूप से यह भारतीय उपभोक्ताओं के लिए बड़ी राहत का समय होना चाहिए था।
लेकिन इसी दौरान केंद्र सरकार ने उत्पाद शुल्क बढ़ाया। परिणाम यह हुआ कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की ऐतिहासिक गिरावट के बावजूद भारत में पेट्रोल की कीमतों में वैसी गिरावट नहीं आई जैसी अपेक्षित थी। कई विश्लेषणों और सार्वजनिक चर्चाओं में इसे "डिकपलिंग" अर्थात् वैश्विक तेल और खुदरा कीमतों के बीच बढ़ते अंतर के रूप में देखा गया।
2021-22: रूस-यूक्रेन युद्ध और तेल संकट
2021 में वैश्विक अर्थव्यवस्था खुलने लगी और मांग बढ़ी। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध ने तेल बाजार को झकझोर दिया।
ब्रेंट क्रूड का औसत मूल्य 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुँच गया।
भारत में पेट्रोल कई शहरों में 100 रुपये प्रति लीटर से ऊपर चला गया। कुछ स्थानों पर यह 110 रुपये से भी अधिक हो गया।
यह वह समय था जब वैश्विक तेल और घरेलू ईंधन कीमतों के बीच संबंध स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
2023-25: तेल सस्ता, पेट्रोल लगभग स्थिर
2023 और 2024 में ब्रेंट क्रूड फिर घटकर लगभग 80 डॉलर के आसपास आ गया। 2025 में इसका औसत लगभग 69 डॉलर प्रति बैरल रहा।
लेकिन भारत में पेट्रोल अधिकांश शहरों में 90 से 100 रुपये के बीच बना रहा।
यहीं से आम नागरिकों के बीच यह प्रश्न तेज हुआ कि जब तेल की कीमतें 2014 के स्तर के आसपास हैं, तो पेट्रोल 2014 की तुलना में इतना महंगा क्यों है? संसद में प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार 2013-14 और 2024-25 के भारतीय क्रूड आयात मूल्यों में बहुत बड़ा अंतर नहीं था, जबकि खुदरा ईंधन कीमतें कहीं अधिक थीं।
भारत में कीमतें क्यों नहीं गिरतीं?
इसके पाँच प्रमुख कारण हैं:
1. करों का बड़ा हिस्सा
पेट्रोल की खुदरा कीमत में करों का योगदान अत्यधिक है। कई राज्यों में कुल कीमत का बड़ा भाग करों से बनता है।
2. रुपये की विनिमय दर
तेल डॉलर में खरीदा जाता है। यदि रुपया कमजोर होता है तो आयात महंगा हो जाता है।
3. तेल विपणन कंपनियों की लागत
रिफाइनिंग, परिवहन और वितरण की लागत भी जुड़ती है।
4. राजकोषीय आवश्यकताएँ
ईंधन कर सरकारों के लिए महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत हैं।
5. मूल्य स्थिरीकरण नीति
सरकार और कंपनियाँ अल्पकालिक उतार-चढ़ाव को तुरंत खुदरा कीमतों में नहीं बदलतीं।
2026: अमेरिका–ईरान समझौता और नई उम्मीद
2026 में पश्चिम एशिया में तनाव कम होने तथा अमेरिका–ईरान समझौते की दिशा में प्रगति से तेल बाजार में नरमी की उम्मीद बढ़ी है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि होर्मुज़ जलडमरूमध्य सुरक्षित रहता है और ईरानी तेल वैश्विक बाजार में अधिक मात्रा में लौटता है, तो कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।
लेकिन भारत में उपभोक्ताओं को इसका पूरा लाभ तभी मिलेगा जब:
वैश्विक गिरावट लंबे समय तक बनी रहे,
रुपये की स्थिति स्थिर रहे,
और कर संरचना में भी समायोजन किया जाए।
निष्कर्ष
2014 से 2026 तक का अनुभव एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने लाता है। भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों से निर्धारित नहीं होतीं। वैश्विक बाजार महत्वपूर्ण है, लेकिन कर नीति, विनिमय दर, राजकोषीय आवश्यकताएँ और सरकारी निर्णय भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
विश्व बाजार में तेल 2014 के लगभग 99 डॉलर से गिरकर कई बार 40–70 डॉलर तक आ चुका है, लेकिन भारत में पेट्रोल उसी अनुपात में सस्ता नहीं हुआ। यही कारण है कि आज ऊर्जा नीति, कर नीति और उपभोक्ता हितों के बीच संतुलन का प्रश्न पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।










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