धर्मांध राष्ट्रवाद और राजनीतिक तोड़फोड़: क्या भारत की दुनिया भर में छवि खराब हो रही है?
लोकतंत्र की प्रतिष्ठा से ‘किलर’ की छवि तक
भारत को लंबे समय तक दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, बहुलतावादी समाज और सहिष्णु सभ्यता के रूप में देखा जाता रहा है। महात्मा गांधी की अहिंसा, जवाहरलाल नेहरू की गुटनिरपेक्षता, डॉ. भीमराव आंबेडकर का संवैधानिक दृष्टिकोण और भारतीय लोकतंत्र की जीवंतता ने भारत को वैश्विक मंच पर एक विशिष्ट नैतिक प्रतिष्ठा प्रदान की थी। भारत केवल एक राष्ट्र-राज्य नहीं, बल्कि विविधताओं के सह-अस्तित्व का एक सफल प्रयोग माना जाता था।
किन्तु पिछले एक दशक में भारत की वैश्विक छवि को लेकर एक नई बहस उभरी है। एक ओर सरकार और उसके समर्थक दावा करते हैं कि भारत पहले से अधिक शक्तिशाली, आत्मविश्वासी और प्रभावशाली हुआ है। दूसरी ओर आलोचकों का तर्क है कि आंतरिक राजनीतिक ध्रुवीकरण, धार्मिक राष्ट्रवाद, असहमति के प्रति असहिष्णुता और सत्ता के बढ़ते केंद्रीकरण ने भारत की लोकतांत्रिक साख को कमजोर किया है।
इसी संदर्भ में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदर्भ में “किलर” शब्द का प्रयोग किया, तो अनेक राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने इसे केवल एक व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं माना। उनके अनुसार यह उस बदलती वैश्विक धारणा का प्रतीक था जिसमें भारत और उसके नेतृत्व को पहले की अपेक्षा अधिक कठोर, आक्रामक और केंद्रीकृत सत्ता के रूप में देखा जाने लगा है।
यह लेख इसी प्रश्न की पड़ताल करता है कि क्या वास्तव में भारत की आंतरिक राजनीति उसकी वैश्विक प्रतिष्ठा को प्रभावित कर रही है।
भारत की पारंपरिक वैश्विक छवि
स्वतंत्रता के बाद भारत ने अपनी पहचान सैन्य शक्ति से अधिक नैतिक शक्ति के रूप में बनाई। जब दुनिया शीत युद्ध में दो खेमों में बँटी हुई थी, तब भारत ने गुटनिरपेक्षता का मार्ग चुना। जब अनेक देश सैन्य तानाशाहियों के अधीन थे, तब भारत ने लोकतांत्रिक चुनावों और संवैधानिक संस्थाओं को मजबूत किया।
भारत की सॉफ्ट पावर उसकी फिल्मों, साहित्य, योग, अध्यात्म और लोकतांत्रिक संस्कृति में निहित थी। दुनिया भारत को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में देखती थी जहाँ असंख्य धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ रहती हैं।
यह छवि भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक पूँजी थी।
नया भारत और नया राष्ट्रवाद
2014 के बाद भारतीय राजनीति में राष्ट्रवाद का स्वर अधिक मुखर हुआ। सरकार ने इसे राष्ट्रीय आत्मविश्वास की वापसी बताया। समर्थकों के अनुसार दशकों तक भारत रक्षात्मक मानसिकता में रहा और अब वह अपने हितों की रक्षा करने वाला, दृढ़ और निर्णायक राष्ट्र बन रहा है।
सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट एयर स्ट्राइक, सीमा विवादों पर कठोर रुख और वैश्विक मंचों पर अधिक आक्रामक कूटनीति को इस नए राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया।
सरकार के समर्थकों का कहना है कि यह परिवर्तन आवश्यक था क्योंकि विश्व राजनीति में सम्मान उन्हीं देशों को मिलता है जो अपनी शक्ति प्रदर्शित कर सकते हैं।
किन्तु आलोचकों का कहना है कि राष्ट्रवाद और अति-राष्ट्रवाद के बीच एक महीन रेखा होती है। जब राष्ट्रवाद आलोचना को राष्ट्र-विरोध और असहमति को शत्रुता के रूप में देखने लगता है, तब वह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चुनौती बन सकता है।
राजनीतिक ध्रुवीकरण और लोकतांत्रिक संस्थाएँ
भारत में चुनावी राजनीति पहले भी तीखी रही है, लेकिन हाल के वर्षों में राजनीतिक ध्रुवीकरण अभूतपूर्व स्तर पर पहुँचा है।
विपक्षी दलों पर केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई, मीडिया संस्थानों पर दबाव के आरोप, विश्वविद्यालयों में वैचारिक संघर्ष और नागरिक समाज संगठनों पर नियंत्रण को लेकर लगातार बहस होती रही है।
सरकार का पक्ष है कि कानून सबके लिए समान है और भ्रष्टाचार या अवैध गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई को राजनीतिक रंग देना गलत है।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन घटनाओं की व्याख्या अलग ढंग से की जाती है। कई विदेशी पर्यवेक्षक इसे संस्थागत स्वतंत्रता में कमी और सत्ता के केंद्रीकरण के संकेत के रूप में देखते हैं।
लोकतंत्र केवल चुनावों का नाम नहीं है। स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र मीडिया, सक्रिय विपक्ष और नागरिक स्वतंत्रताएँ भी उसकी आधारशिला हैं। जब इन संस्थाओं की स्वतंत्रता पर प्रश्न उठते हैं, तब देश की लोकतांत्रिक प्रतिष्ठा प्रभावित होती है।
धार्मिक राष्ट्रवाद और वैश्विक चिंता
भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष और समावेशी राज्य की परिकल्पना करता है। लेकिन पिछले वर्षों में धार्मिक पहचान राजनीति का केंद्रीय तत्व बनती गई है।
राम मंदिर आंदोलन, नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), समान नागरिक संहिता पर बहस और विभिन्न सांप्रदायिक घटनाओं ने देश के भीतर और बाहर व्यापक चर्चा को जन्म दिया।
सरकार और उसके समर्थकों का तर्क है कि यह ऐतिहासिक अन्यायों के समाधान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की प्रक्रिया है।
आलोचक इसे धार्मिक बहुसंख्यकवाद की ओर बढ़ते कदम के रूप में देखते हैं।
यूरोप, अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र से जुड़े अनेक मंचों पर समय-समय पर धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर चिंता व्यक्त की गई है।
चाहे इन रिपोर्टों से सहमति हो या असहमति, यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि वे भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को प्रभावित करती हैं।
वैश्विक मीडिया की भूमिका
आज किसी देश की छवि केवल उसकी सरकार नहीं बनाती, बल्कि वैश्विक मीडिया भी उसे आकार देता है।
भारत से संबंधित समाचारों में पिछले वर्षों में आर्थिक उपलब्धियों के साथ-साथ लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक तनावों के मुद्दे भी प्रमुखता से सामने आए हैं।
सरकार समर्थक वर्ग का आरोप है कि पश्चिमी मीडिया भारत के प्रति पूर्वाग्रह रखता है और उसकी उपलब्धियों को कम करके दिखाता है।
दूसरी ओर आलोचक कहते हैं कि यदि बार-बार समान प्रकार की चिंताएँ सामने आ रही हैं, तो उन्हें पूरी तरह षड्यंत्र कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
सच्चाई शायद इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच कहीं स्थित है।
ट्रम्प का “किलर” और उसका राजनीतिक अर्थ
डोनाल्ड ट्रम्प अपनी असाधारण और विवादास्पद भाषा के लिए प्रसिद्ध हैं। वे अनेक विश्व नेताओं के बारे में चौंकाने वाले शब्दों का प्रयोग करते रहे हैं।
लेकिन जब किसी भारतीय नेता के संदर्भ में “किलर” जैसा शब्द सामने आता है, तो वह सामान्य राजनीतिक टिप्पणी से अधिक महत्व ग्रहण कर लेता है।
यह आवश्यक नहीं कि ट्रम्प का आशय वही हो जो आलोचक निकालते हैं। संभव है कि वह शक्ति, दृढ़ता या राजनीतिक प्रभावशीलता के अर्थ में कहा गया हो।
फिर भी इस शब्द ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया—क्या दुनिया भारतीय नेतृत्व को अब पहले की तुलना में अधिक कठोर, केंद्रीकृत और शक्ति-प्रधान दृष्टि से देखने लगी है?
राजनीतिक प्रतीकों की दुनिया में शब्दों का प्रभाव वास्तविक नीतियों जितना गहरा हो सकता है।
विदेश नीति पर प्रभाव
आंतरिक राजनीति और विदेश नीति को पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता।
किसी देश की वैश्विक विश्वसनीयता उसकी घरेलू व्यवस्था से भी निर्मित होती है।
यदि कोई देश लोकतंत्र, बहुलवाद और मानवाधिकारों का सम्मान करता दिखाई देता है, तो उसकी नैतिक साख बढ़ती है। यदि उसके बारे में विपरीत धारणा बनती है, तो उसकी सॉफ्ट पावर कमजोर पड़ सकती है।
भारत की विदेश नीति लंबे समय तक नैतिक नेतृत्व और विकासशील देशों की आवाज़ के रूप में देखी जाती थी।
आज भारत आर्थिक और सामरिक शक्ति के रूप में तो मजबूत हुआ है, लेकिन उसकी नैतिक नेतृत्व क्षमता को लेकर प्रश्न उठ रहे हैं।
क्या आलोचना पूरी तरह सही है?
इस बहस का दूसरा पक्ष भी है।
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। डिजिटल भुगतान, अंतरिक्ष कार्यक्रम, आधार, यूपीआई और बुनियादी ढाँचे के विकास ने वैश्विक स्तर पर प्रशंसा प्राप्त की है।
भारत ने कोविड महामारी के दौरान अनेक देशों को वैक्सीन उपलब्ध कराई। जी-20 की अध्यक्षता सफलतापूर्वक निभाई। वैश्विक दक्षिण के मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया।
इन उपलब्धियों को नजरअंदाज करके केवल आलोचनात्मक चित्र प्रस्तुत करना भी उचित नहीं होगा।
वास्तविकता यह है कि भारत की छवि आज दो विरोधी धाराओं के बीच निर्मित हो रही है—एक ओर आर्थिक और सामरिक शक्ति का उदय, दूसरी ओर लोकतांत्रिक और सामाजिक चिंताएँ।
भारत के सामने वास्तविक चुनौती
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी आर्थिक और सामरिक शक्ति को लोकतांत्रिक विश्वसनीयता के साथ जोड़ने की है।
सिर्फ विकास पर्याप्त नहीं है।
सिर्फ चुनाव पर्याप्त नहीं हैं।
सिर्फ राष्ट्रवाद भी पर्याप्त नहीं है।
एक महान शक्ति बनने के लिए संस्थागत मजबूती, सामाजिक समावेशिता, संवैधानिक प्रतिबद्धता और लोकतांत्रिक संस्कृति का संरक्षण आवश्यक है।
यदि भारत इन मूल्यों को मजबूत करता है, तो उसकी वैश्विक प्रतिष्ठा और प्रभाव दोनों बढ़ेंगे।
लेकिन यदि राजनीतिक ध्रुवीकरण, धार्मिक कट्टरता और असहमति के प्रति असहिष्णुता बढ़ती है, तो उसकी उपलब्धियाँ भी आलोचनाओं के बोझ तले दब सकती हैं।
निष्कर्ष
भारत आज इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। वह आर्थिक शक्ति बन रहा है, तकनीकी नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है और वैश्विक मंचों पर उसकी उपस्थिति बढ़ रही है। लेकिन किसी राष्ट्र की महानता केवल उसकी आर्थिक या सैन्य क्षमता से नहीं मापी जाती।
दुनिया उन देशों का सम्मान करती है जो शक्ति के साथ उदारता, विकास के साथ न्याय और राष्ट्रवाद के साथ लोकतंत्र को भी महत्व देते हैं।
यदि भारत अपनी लोकतांत्रिक परंपराओं, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक विविधता की रक्षा करता है, तो उसकी वैश्विक छवि पहले से कहीं अधिक मजबूत हो सकती है।
लेकिन यदि दबंग राजनीति, धार्मिक ध्रुवीकरण और संस्थागत कमजोरियाँ उसकी पहचान बन जाती हैं, तो “विश्वगुरु” का सपना केवल राजनीतिक नारा बनकर रह जाएगा।
भारत की वास्तविक शक्ति उसकी सेना, अर्थव्यवस्था या सरकार में ही नहीं, बल्कि उसकी लोकतांत्रिक आत्मा में निहित है। उसी आत्मा की रक्षा भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा की सबसे बड़ी गा










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