चाबहार पर लौटेगा भारत

भारत की विदेश नीति में कुछ परियोजनाएँ ऐसी हैं जो केवल व्यापार या निवेश का विषय नहीं होतीं, बल्कि राष्ट्रीय रणनीति, भू-राजनीतिक प्रभाव और भविष्य की आर्थिक दिशा को भी निर्धारित करती हैं। ईरान का चाबहार बंदरगाह ऐसी ही एक परियोजना है। पिछले एक दशक में जब भी भारत, मध्य एशिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और चीन की चर्चा होती है, चाबहार का नाम अनिवार्य रूप से सामने आता है। कुछ वर्षों तक ऐसा लगा कि अमेरिकी प्रतिबंधों, अफगानिस्तान की अस्थिरता और ईरान-चीन की बढ़ती निकटता के कारण चाबहार भारत की प्राथमिकताओं से पीछे छूट गया है। लेकिन हाल के अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या चाबहार फिर से भारत के रणनीतिक मानचित्र पर लौट रहा है? यह प्रश्न केवल एक बंदरगाह का नहीं है। यह भारत की उस दीर्घकालिक रणनीति से जुड़ा है जिसके माध्यम से वह पाकिस्तान को बाईपास करते हुए मध्य एशिया, रूस और यूरोप तक पहुँच बनाना चाहता है। यह चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना के सामने भारत की वैकल्पिक दृष्टि का भी प्रतीक है। चाबहार कहाँ है और क्यों महत्वपूर्ण है? चाबहार ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में अरब सागर के तट पर स्थित एक गहरे पानी का बंदरगाह है। यह ईरान का एकमात्र महासागरीय बंदरगाह माना जाता है। भौगोलिक दृष्टि से इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से लगभग 70–80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहीं से इसकी रणनीतिक कहानी शुरू होती है। ग्वादर चीन की सहायता से विकसित हुआ है और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का महत्वपूर्ण केंद्र है। दूसरी ओर चाबहार भारत के सहयोग से विकसित हुआ है। इस प्रकार ये दोनों बंदरगाह केवल व्यापारिक परियोजनाएँ नहीं बल्कि एशिया की बदलती शक्ति राजनीति के प्रतीक बन गए हैं। भारत को चाबहार की आवश्यकता क्यों पड़ी? भारत और अफगानिस्तान के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंध रहे हैं। लेकिन भारत और अफगानिस्तान के बीच पाकिस्तान स्थित है। पाकिस्तान ने लंबे समय तक भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी भूमि पहुँच देने से इनकार किया। इस स्थिति ने भारत के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी। यदि भारत अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँचना चाहता था तो उसे वैकल्पिक मार्ग तलाशना ही था। यहीं चाबहार का महत्व सामने आया। भारत ने ईरान के साथ मिलकर ऐसा समुद्री और स्थलीय मार्ग विकसित करने की कल्पना की जिसके माध्यम से भारतीय सामान चाबहार तक समुद्र से पहुँचे और वहाँ से सड़क तथा रेल नेटवर्क के माध्यम से अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक जाएँ। चाबहार : केवल बंदरगाह नहीं, एक रणनीतिक गलियारा अनेक लोग चाबहार को केवल बंदरगाह परियोजना मानते हैं, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक व्यापक है। यह परियोजना तीन स्तरों पर कार्य करती है— 1. आर्थिक स्तर भारत के लिए नए बाजारों तक पहुँच। 2. रणनीतिक स्तर पाकिस्तान पर निर्भरता समाप्त करना। 3. भू-राजनीतिक स्तर चीन के बढ़ते प्रभाव का संतुलन बनाना। इस दृष्टि से चाबहार भारत की विदेश नीति की सबसे महत्वपूर्ण परियोजनाओं में से एक है। अफगानिस्तान और चाबहार चाबहार की मूल अवधारणा अफगानिस्तान से जुड़ी हुई थी। जब अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक सरकार थी तब भारत ने वहाँ सड़कों, बांधों, संसद भवन और अनेक विकास परियोजनाओं में निवेश किया। इन परियोजनाओं को सफल बनाने के लिए एक विश्वसनीय व्यापारिक मार्ग आवश्यक था। चाबहार ने यह भूमिका निभाई। भारत से गेहूँ और अन्य मानवीय सहायता सामग्री चाबहार के माध्यम से अफगानिस्तान पहुँचाई गई। इससे यह सिद्ध हुआ कि पाकिस्तान को बाईपास करते हुए भी भारत अफगानिस्तान तक पहुँच सकता है। अमेरिकी प्रतिबंध और परियोजना की रफ्तार चाबहार की सबसे बड़ी समस्या ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंध रहे। जब अमेरिका ने ईरान पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाए तो अनेक अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ ईरान में निवेश करने से हिचकने लगीं। भारत भी कठिन स्थिति में आ गया। एक ओर ईरान उसका महत्वपूर्ण साझेदार था। दूसरी ओर अमेरिका भारत का प्रमुख रणनीतिक सहयोगी बन चुका था। इस कारण चाबहार परियोजना की गति अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच सकी। हालाँकि अमेरिका ने कुछ मामलों में चाबहार को विशेष छूट भी दी क्योंकि यह अफगानिस्तान के विकास से जुड़ा हुआ था। फिर भी अनिश्चितता बनी रही। तालिबान की वापसी और नई चुनौतियाँ 2021 में तालिबान की सत्ता वापसी ने पूरे क्षेत्रीय समीकरण बदल दिए। कई लोगों ने सोचा कि अब चाबहार का महत्व कम हो जाएगा। लेकिन वास्तव में स्थिति इतनी सरल नहीं थी। अफगानिस्तान आज भी मध्य एशिया तक पहुँच का महत्वपूर्ण मार्ग है। इसके अतिरिक्त भारत की मध्य एशिया नीति केवल अफगानिस्तान तक सीमित नहीं है। इसलिए चाबहार का महत्व पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। बल्कि नई परिस्थितियों में इसके उपयोग के नए तरीके खोजने की आवश्यकता उत्पन्न हुई। चीन का बढ़ता प्रभाव और भारत की चिंता पिछले कुछ वर्षों में ईरान और चीन के संबंध मजबूत हुए हैं। चीन ने ईरान में बड़े निवेश की योजनाएँ प्रस्तुत की हैं। इससे भारत में यह आशंका पैदा हुई कि कहीं चाबहार भी चीन के प्रभाव क्षेत्र में न चला जाए। यदि ऐसा होता तो भारत की दीर्घकालिक रणनीति को गंभीर झटका लग सकता था। लेकिन ईरान की विदेश नीति केवल चीन पर आधारित नहीं है। ईरान भारत, रूस, चीन और अन्य देशों के साथ संतुलन बनाए रखने का प्रयास करता है। यही कारण है कि चाबहार में भारत की भूमिका अभी भी महत्वपूर्ण बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) चाबहार का भविष्य केवल अफगानिस्तान से नहीं जुड़ा है। यह अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे का भी हिस्सा है। यह परियोजना भारत, ईरान, रूस और अन्य देशों को जोड़ती है। यदि यह पूर्ण रूप से विकसित हो जाती है तो भारत से रूस और यूरोप तक माल पहुँचाने में समय और लागत दोनों कम हो सकते हैं। आज जब वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ बदल रही हैं, तब यह परियोजना और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। क्या अमेरिका-ईरान संबंधों में सुधार से चाबहार को लाभ होगा? यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होता है तो इसका सीधा लाभ चाबहार को मिल सकता है। क्यों? क्योंकि निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा। व्यापारिक जोखिम कम होंगे। बीमा और शिपिंग लागत घटेगी। अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ अधिक सहजता से निवेश कर सकेंगी। भारत भी अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकेगा। यानी पश्चिम एशिया में स्थिरता का सबसे बड़ा लाभार्थी चाबहार बन सकता है। भारत के लिए अवसर चाबहार भारत को कई अवसर प्रदान करता है— मध्य एशिया तक पहुँच कजाखस्तान, उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान जैसे देशों के साथ व्यापार बढ़ाने का अवसर। ऊर्जा सुरक्षा मध्य एशिया और ईरान के ऊर्जा संसाधनों तक बेहतर पहुँच। व्यापार विस्तार नए बाजारों में भारतीय उत्पादों की पहुँच। रणनीतिक प्रभाव क्षेत्रीय राजनीति में भारत की भूमिका का विस्तार। चुनौतियाँ भी कम नहीं हालाँकि संभावनाएँ बड़ी हैं, लेकिन चुनौतियाँ भी मौजूद हैं। राजनीतिक अस्थिरता पश्चिम एशिया विश्व के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है। प्रतिबंधों का खतरा भविष्य में फिर से प्रतिबंध लग सकते हैं। चीन की प्रतिस्पर्धा चीन की आर्थिक क्षमता भारत से कहीं अधिक है। सुरक्षा जोखिम समुद्री और क्षेत्रीय सुरक्षा की चुनौतियाँ बनी हुई हैं। क्या चाबहार भारत को मध्य एशिया का द्वार बना सकता है? कई विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दशक में चाबहार भारत की "कनेक्टिविटी रणनीति" का केंद्र बन सकता है। भारत आज केवल दक्षिण एशिया तक सीमित शक्ति नहीं रहना चाहता। वह हिंद महासागर, मध्य एशिया और यूरेशिया तक अपना आर्थिक प्रभाव बढ़ाना चाहता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति में चाबहार महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भविष्य की दिशा यदि भारत को चाबहार से अधिकतम लाभ उठाना है तो उसे केवल बंदरगाह विकास तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे— रेल नेटवर्क में निवेश, लॉजिस्टिक्स सुविधाओं का विस्तार, व्यापारिक गलियारों का विकास, डिजिटल और सीमा शुल्क सहयोग, और क्षेत्रीय साझेदारियों को मजबूत करना होगा। तभी चाबहार एक वास्तविक आर्थिक शक्ति केंद्र बन सकेगा। निष्कर्ष चाबहार केवल ईरान का बंदरगाह नहीं है; यह भारत की भू-राजनीतिक कल्पना का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। यह उस भारत का प्रतीक है जो अपने व्यापार और रणनीतिक हितों को सीमित भौगोलिक बाधाओं से मुक्त करना चाहता है। अमेरिकी प्रतिबंधों, अफगानिस्तान की अस्थिरता और क्षेत्रीय तनावों ने इसकी प्रगति को धीमा अवश्य किया, लेकिन इसकी उपयोगिता समाप्त नहीं हुई। बल्कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में इसका महत्व और बढ़ सकता है। इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि "क्या चाबहार भारत लौटेगा?" बल्कि यह है कि "क्या भारत चाबहार को अपनी दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टि का केंद्र बनाने के लिए पर्याप्त राजनीतिक इच्छाशक्ति और आर्थिक निवेश दिखा पाएगा?" यदि उत्तर हाँ है, तो आने वाले वर्षों में चाबहार केवल एक बंदरगाह नहीं बल्कि भारत के पश्चिम की ओर खुलने वाले सबसे महत्वपूर्ण द्वार के रूप में स्थापित हो सकता है। संभव है कि इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक के अंत में इतिहासकार लिखें कि जिस समय दुनिया चीन के ग्वादर को देख रही थी, उसी समय भारत चुपचाप चाबहार के माध्यम से मध्य एशिया और यूरेशिया तक अपना मार्ग बना रहा था।

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