सूट-बूट के दौर में नैतिकता का धोती-कुर्ता क्यों पहने है भारत?
क्या आदर्शवाद ने भारतीय विदेश नीति को यथार्थवाद से पीछे कर दिया है?
विश्व राजनीति आदर्शों से नहीं, बल्कि शक्ति, राष्ट्रीय हित और सामरिक क्षमता से संचालित होती है। फिर भी भारत की विदेश नीति में लंबे समय तक नैतिकता, शांतिवाद, सह-अस्तित्व, पंचशील, गुटनिरपेक्षता और "वसुधैव कुटुम्बकम्" जैसे आदर्शों को प्रमुख स्थान मिला। प्रश्न यह है कि जब दुनिया "सूट-बूट" यानी शक्ति, पूँजी, तकनीक और सामरिक हितों की भाषा बोल रही है, तब क्या भारत अब भी "धोती-कुर्ता" यानी नैतिक आदर्शवाद की भाषा अधिक बोलता है?
यह प्रश्न एक रूपक है, लेकिन आज की वैश्विक राजनीति में इसकी प्रासंगिकता बढ़ गई है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भारत ने एक ऐसी विदेश नीति अपनाई जिसमें नैतिक नेतृत्व को विशेष महत्व दिया गया। उपनिवेशवाद का विरोध, रंगभेद के विरुद्ध आवाज़, शांति और निरस्त्रीकरण का समर्थन—इन सबने भारत को नैतिक प्रतिष्ठा दिलाई। लेकिन इसी अवधि में चीन ने आर्थिक और सैन्य शक्ति बढ़ाई, अमेरिका ने वैश्विक गठबंधन बनाए और सोवियत संघ ने प्रभाव-क्षेत्र स्थापित किए। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में सम्मान अंततः शक्ति-संतुलन से तय होता रहा।
आज भी भारत जलवायु परिवर्तन, वैश्विक दक्षिण, मानवता और शांति की बात करता है। यह उसकी सॉफ्ट पावर की ताकत है। लेकिन केवल नैतिक अपील से न तो United Nations Security Council की स्थायी सदस्यता मिलती है, न ही वैश्विक संस्थाओं में प्रभाव स्वतः बढ़ता है।
हालाँकि यह कहना भी उचित नहीं होगा कि भारत केवल आदर्शवाद से चलता है। पिछले वर्षों में भारत ने अपनी विदेश नीति में अधिक यथार्थवादी दृष्टिकोण भी अपनाया है। रूस से रक्षा सहयोग बनाए रखते हुए अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी, पश्चिम एशिया के विभिन्न देशों के साथ समानांतर संबंध, हिंद-प्रशांत में सक्रिय भूमिका और सीमा सुरक्षा पर अधिक ध्यान—ये सभी अधिक व्यावहारिक कूटनीति के उदाहरण हैं।
वास्तविक चुनौती नैतिकता और यथार्थवाद में से किसी एक को चुनने की नहीं है। चुनौती यह है कि भारत अपनी नैतिक छवि को शक्ति से समर्थित करे। नैतिकता तब प्रभावशाली बनती है जब उसके पीछे आर्थिक क्षमता, तकनीकी नेतृत्व, सैन्य शक्ति और कूटनीतिक प्रभाव हो।
निष्कर्ष
"सूट-बूट के दौर में नैतिकता का धोती-कुर्ता पहने भारत" एक प्रभावशाली रूपक है, जो यह प्रश्न उठाता है कि क्या भारत अपनी आदर्शवादी विरासत और बदलती वैश्विक राजनीति के बीच सही संतुलन बना पा रहा है।
यदि भारत केवल नैतिकता की बात करेगा और शक्ति निर्माण में पीछे रहेगा, तो उसकी आवाज़ सीमित प्रभाव डालेगी। लेकिन यदि वह शक्ति के साथ नैतिक नेतृत्व भी बनाए रखे, तो यही उसकी विशिष्ट पहचान बन सकती है। इसलिए लक्ष्य नैतिकता छोड़ना नहीं, बल्कि नैतिकता को राष्ट्रीय शक्ति से समर्थित करना होना चाहिए। यही 21वीं सदी की भारतीय कूटनीति की सबसे बड़ी आवश्यकता है।









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