निजीकरण पर्याप्त नहीं: आर्थिक गतिशीलता के लिए आवश्यक है, पर अर्थव्यवस्था की रीढ़ सरकारी नियोजन और मध्यवर्ग है

पिछले तीन दशकों में भारत सहित विश्व के अनेक देशों में यह धारणा मजबूत हुई है कि निजीकरण, उदारीकरण और वैश्वीकरण ही आर्थिक विकास के सबसे प्रभावी साधन हैं। 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत ने भी राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था से बाज़ार-उन्मुख अर्थव्यवस्था की ओर कदम बढ़ाया। इस परिवर्तन ने निवेश, उत्पादन, तकनीकी विकास और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के नए अवसर खोले। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि निजी क्षेत्र ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। किन्तु एक प्रश्न लगातार प्रासंगिक बना हुआ है—क्या केवल निजीकरण के आधार पर कोई राष्ट्र दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता प्राप्त कर सकता है? क्या आर्थिक विकास का पूरा ढाँचा बाजार की शक्तियों पर छोड़ देना उचित है? क्या निजी क्षेत्र राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का पूर्ण विकल्प बन सकता है? इन प्रश्नों का उत्तर खोजने पर स्पष्ट होता है कि निजीकरण आर्थिक गतिशीलता का एक महत्वपूर्ण साधन अवश्य है, परंतु किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था की वास्तविक रीढ़ सरकारी नियोजन, सार्वजनिक निवेश और एक मजबूत मध्यवर्ग होता है। निजी क्षेत्र अर्थव्यवस्था को गति देता है, लेकिन संकट के समय उसे संभालने का कार्य प्रायः राज्य और सार्वजनिक संस्थाएँ ही करती हैं। वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में थोड़ी-सी अस्थिरता निजी क्षेत्र को तुरंत प्रभावित कर सकती है, जबकि सरकारी नियोजन अर्थव्यवस्था को स्थायित्व और सुरक्षा प्रदान करता है। निजीकरण का अर्थ और उसका महत्व निजीकरण का अर्थ है कि उत्पादन, वितरण और सेवाओं में सरकार की भूमिका को कम करके निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाई जाए। इसके पीछे यह विचार है कि निजी संस्थाएँ लाभ कमाने की प्रेरणा से अधिक कुशलता, नवाचार और प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करती हैं। निजीकरण के कुछ प्रमुख लाभ हैं— उत्पादन क्षमता में वृद्धि प्रतिस्पर्धा के कारण गुणवत्ता में सुधार तकनीकी नवाचार विदेशी निवेश का आकर्षण प्रशासनिक दक्षता रोजगार के नए अवसर भारत में दूरसंचार, विमानन, सूचना प्रौद्योगिकी, ई-कॉमर्स और वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों में निजी क्षेत्र ने उल्लेखनीय प्रगति की है। आज भारत विश्व की प्रमुख डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, जिसका बड़ा श्रेय निजी निवेश और उद्यमिता को जाता है। लेकिन आर्थिक विकास और आर्थिक स्थिरता दो अलग-अलग अवधारणाएँ हैं। निजीकरण विकास की गति बढ़ा सकता है, परंतु स्थिरता की गारंटी नहीं देता। वैश्विक पूँजीवाद की अंतर्निहित अस्थिरता निजी क्षेत्र का संचालन मुख्यतः लाभ और बाजार संकेतों पर आधारित होता है। इसलिए वह वैश्विक परिस्थितियों से अत्यधिक प्रभावित होता है। इतिहास में कई उदाहरण मिलते हैं— 2008 की वैश्विक मंदी अमेरिका के वित्तीय क्षेत्र में उत्पन्न संकट ने कुछ ही महीनों में पूरी दुनिया को प्रभावित कर दिया। बड़े-बड़े निजी बैंक और वित्तीय संस्थान दिवालिया होने लगे। शेयर बाजार धराशायी हो गए। उस समय यह स्पष्ट हो गया कि मुक्त बाजार स्वयं को हमेशा नियंत्रित नहीं कर सकता। अंततः सरकारों को हस्तक्षेप करना पड़ा और अरबों डॉलर के राहत पैकेज देकर वित्तीय व्यवस्था को बचाना पड़ा। कोविड-19 महामारी 2020 में महामारी के दौरान दुनिया भर के निजी उद्योग अचानक बंद होने लगे। लाखों लोगों की नौकरियाँ चली गईं। आपूर्ति शृंखलाएँ टूट गईं। लेकिन इसी समय सरकारी संस्थाओं ने स्वास्थ्य सेवाएँ, खाद्य सुरक्षा, मुफ्त टीकाकरण और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई। यदि राज्य हस्तक्षेप न करता तो आर्थिक संकट कहीं अधिक गहरा हो सकता था। रूस-यूक्रेन युद्ध युद्ध के कारण ऊर्जा और खाद्यान्न बाजार में अस्थिरता आई। कई निजी उद्योग प्रभावित हुए। सरकारों को सब्सिडी, मूल्य नियंत्रण और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों के माध्यम से जनता को राहत देनी पड़ी। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि निजी क्षेत्र आर्थिक गतिविधि को आगे बढ़ाता है, लेकिन संकट के समय अर्थव्यवस्था को संभालने का कार्य सरकार ही करती है। सरकारी नियोजन: अर्थव्यवस्था का स्थायित्व तंत्र सरकारी नियोजन केवल योजनाएँ बनाने तक सीमित नहीं है। इसका अर्थ है— दीर्घकालिक विकास की रणनीति आधारभूत संरचना में निवेश शिक्षा और स्वास्थ्य का विस्तार सामाजिक सुरक्षा क्षेत्रीय संतुलन आर्थिक संकटों का प्रबंधन यदि अर्थव्यवस्था को एक भवन माना जाए तो निजी क्षेत्र उसकी दीवारें और सजावट हो सकता है, लेकिन उसकी नींव सरकारी नियोजन ही होती है। भारत में रेलवे, सड़कें, बंदरगाह, बिजली, सिंचाई, सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी आधारभूत संरचनाएँ मुख्यतः सरकारी निवेश से विकसित हुई हैं। इन्हीं के आधार पर निजी उद्योग फलते-फूलते हैं। क्यों सरकारी नियोजन अर्थव्यवस्था की रीढ़ है? 1. दीर्घकालिक दृष्टि निजी क्षेत्र आमतौर पर लाभ की तात्कालिक संभावनाओं पर ध्यान देता है। इसके विपरीत सरकारें दशकों आगे की योजना बना सकती हैं। उदाहरण के लिए— राष्ट्रीय राजमार्ग मेट्रो रेल जल संरक्षण परियोजनाएँ परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम अंतरिक्ष अनुसंधान इन क्षेत्रों में निवेश का लाभ तुरंत नहीं मिलता, लेकिन राष्ट्र की दीर्घकालिक आर्थिक क्षमता इन्हीं पर आधारित होती है। 2. संतुलित विकास निजी निवेश प्रायः उन्हीं क्षेत्रों में जाता है जहाँ लाभ की संभावना अधिक होती है। परंतु देश के दूरस्थ और पिछड़े क्षेत्रों में— स्कूल अस्पताल सड़कें सिंचाई परियोजनाएँ अक्सर सरकारी निवेश से ही विकसित होती हैं। यदि सब कुछ बाजार पर छोड़ दिया जाए तो क्षेत्रीय असमानताएँ बढ़ सकती हैं। 3. संकट प्रबंधन किसी भी आर्थिक संकट में अंतिम आश्रयदाता सरकार ही होती है। अर्थशास्त्र में इसे "लेंडर ऑफ लास्ट रिज़ॉर्ट" की अवधारणा कहा जाता है। जब निजी क्षेत्र पीछे हटता है, तब सरकार आगे बढ़ती है। सरकारी नियोजन और मध्यवर्ग का संबंध किसी भी आधुनिक राष्ट्र की स्थिरता का सबसे बड़ा आधार उसका मध्यवर्ग होता है। मध्यवर्ग— उत्पादन करता है उपभोग करता है कर देता है बचत करता है निवेश करता है अर्थव्यवस्था का सबसे स्थायी उपभोक्ता वर्ग मध्यवर्ग ही होता है। भारत में सरकारी कर्मचारियों, शिक्षकों, बैंककर्मियों, रेलवे कर्मचारियों, इंजीनियरों, डॉक्टरों और अन्य सार्वजनिक सेवकों ने एक मजबूत मध्यवर्ग का निर्माण किया है। यह वर्ग आर्थिक झटकों के समय भी अपेक्षाकृत स्थिर रहता है। सरकारी रोजगार और मध्यवर्ग का निर्माण स्वतंत्रता के बाद भारत में सरकारी रोजगार ने लाखों परिवारों को गरीबी से बाहर निकाला। एक सरकारी कर्मचारी— नियमित आय प्राप्त करता है बच्चों की शिक्षा पर निवेश करता है स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग करता है मकान बनाता है स्थानीय बाजार में खर्च करता है इस प्रकार एक नौकरी केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक-आर्थिक तंत्र को प्रभावित करती है। भारत का बड़ा हिस्सा ऐसा है जहाँ मध्यवर्ग के निर्माण में सरकारी नौकरियों की निर्णायक भूमिका रही है। निजीकरण और रोजगार की अस्थिरता निजी क्षेत्र रोजगार देता है, लेकिन उसकी प्रकृति अक्सर बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर होती है। जब लाभ बढ़ता है तो नियुक्तियाँ बढ़ती हैं। जब संकट आता है तो— छँटनी होती है वेतन घटता है अनुबंध समाप्त होते हैं हाल के वर्षों में वैश्विक तकनीकी कंपनियों में बड़े पैमाने पर छँटनियाँ इसका उदाहरण हैं। इसके विपरीत सरकारी रोजगार अपेक्षाकृत स्थिर होता है। यही स्थिरता मध्यवर्ग को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती है। क्या निजीकरण का विरोध किया जाना चाहिए? नहीं। निजीकरण का विरोध करना उतना ही अव्यावहारिक है जितना उसे सर्वसमाधान मान लेना। वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि निजीकरण हो या न हो। वास्तविक प्रश्न यह है कि— निजीकरण और सरकारी नियोजन के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था में— निजी क्षेत्र नवाचार लाता है। सरकार स्थिरता प्रदान करती है। बाजार प्रतिस्पर्धा पैदा करता है। सार्वजनिक संस्थाएँ सामाजिक न्याय सुनिश्चित करती हैं। विश्व के सफल मॉडल जर्मनी जर्मनी की सफलता केवल निजी उद्योगों के कारण नहीं है। वहाँ मजबूत सार्वजनिक संस्थाएँ, सामाजिक सुरक्षा और तकनीकी शिक्षा व्यवस्था मौजूद है। जापान जापान में निजी उद्योग अत्यंत शक्तिशाली हैं, लेकिन सरकार की औद्योगिक नीति और दीर्घकालिक नियोजन ने ही उसके विकास की नींव रखी। दक्षिण कोरिया सरकार और निजी उद्योगों के समन्वय ने दक्षिण कोरिया को विकसित राष्ट्र बनाया। चीन चीन का मॉडल दिखाता है कि सरकारी नियोजन और बाजार तंत्र का मिश्रण किस प्रकार तीव्र आर्थिक विकास ला सकता है। इन सभी उदाहरणों में राज्य की भूमिका निर्णायक रही है। भारत के लिए क्या रास्ता उचित है? भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिए न तो पूर्ण सरकारी नियंत्रण उपयुक्त है और न ही पूर्ण निजीकरण। भारत को ऐसी मिश्रित अर्थव्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें— शिक्षा और स्वास्थ्य में सरकारी निवेश बढ़े। आधारभूत संरचना का विस्तार हो। सरकारी रिक्त पदों को भरा जाए। निजी निवेश को प्रोत्साहित किया जाए। लघु और मध्यम उद्योगों को संरक्षण मिले। सामाजिक सुरक्षा तंत्र मजबूत हो। मध्यवर्ग की क्रय-शक्ति बढ़ाई जाए। निष्कर्ष निजीकरण आधुनिक अर्थव्यवस्था की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। यह प्रतिस्पर्धा, नवाचार और उत्पादन क्षमता को बढ़ाता है। लेकिन यह मान लेना कि केवल निजीकरण ही आर्थिक विकास का मार्ग है, एक अधूरी और सरलीकृत सोच होगी। वैश्विक आर्थिक इतिहास बताता है कि बाजार जितना अवसर पैदा करता है, उतनी ही अस्थिरता भी उत्पन्न कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय संकट, युद्ध, महामारी या वित्तीय उथल-पुथल की स्थिति में निजी क्षेत्र सबसे पहले प्रभावित होता है। ऐसे समय में सरकारी नियोजन, सार्वजनिक निवेश और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था ही अर्थव्यवस्था को संभालती है। वास्तव में किसी राष्ट्र की आर्थिक संरचना को स्थायित्व प्रदान करने वाली शक्ति उसका सुविचारित सरकारी नियोजन और व्यापक मध्यवर्ग होता है। निजी क्षेत्र अर्थव्यवस्था को गति देता है, लेकिन सरकारी संस्थाएँ और सार्वजनिक रोजगार उसे संतुलन और सुरक्षा प्रदान करते हैं। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि निजीकरण आर्थिक गतिशीलता का इंजन है, किंतु सरकारी नियोजन और सशक्त मध्यवर्ग अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। एक विकसित, स्थिर और समावेशी भारत के निर्माण के लिए इन दोनों के बीच संतुलित समन्वय ही सबसे प्रभावी मार्ग है।

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