क्या सैन्यीकृत जापान भारत के हित में है?
यह प्रश्न केवल भारत-जापान संबंधों का नहीं, बल्कि पूरे एशिया के शक्ति-संतुलन का प्रश्न है। इसका उत्तर सीधा "हाँ" या "नहीं" में नहीं दिया जा सकता। भारत के दृष्टिकोण से एक जिम्मेदार, लोकतांत्रिक और संतुलित रूप से सशक्त जापान उसके हित में है, लेकिन आक्रामक या अनियंत्रित सैन्यवाद किसी के भी हित में नहीं होगा।
भारत जापान को क्यों महत्वपूर्ण मानता है?
India और Japan दोनों एशिया में ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें किसी एक शक्ति का पूर्ण वर्चस्व न हो।
आज एशिया में China की बढ़ती आर्थिक और सैन्य शक्ति ने शक्ति-संतुलन की बहस को जन्म दिया है। भारत के लिए जापान एक ऐसा साझेदार है जो—
लोकतांत्रिक व्यवस्था का समर्थक है,
नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का पक्षधर है,
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्वतंत्र नौवहन का समर्थक है,
और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने की क्षमता रखता है।
इस दृष्टि से जापान का सशक्त होना भारत के हित में दिखाई देता है।
भारत को क्या लाभ हो सकता है?
1. एशिया में शक्ति संतुलन
यदि एशिया में केवल चीन ही सैन्य और आर्थिक रूप से अत्यधिक प्रभावशाली हो जाए तो क्षेत्रीय संतुलन प्रभावित हो सकता है।
एक मजबूत जापान एशिया में संतुलनकारी शक्ति के रूप में कार्य कर सकता है।
2. हिंद-प्रशांत की सुरक्षा
भारत का लगभग 90 प्रतिशत व्यापार समुद्री मार्गों से होता है।
जापान की मजबूत नौसैनिक क्षमता हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को मजबूत कर सकती है।
3. QUAD को मजबूती
Quadrilateral Security Dialogue की प्रभावशीलता काफी हद तक उसके सदस्य देशों की क्षमता पर निर्भर करती है।
जापान की बढ़ती रक्षा क्षमता QUAD को अधिक प्रभावी बना सकती है।
4. तकनीकी और रक्षा सहयोग
जापान दुनिया की अग्रणी तकनीकी शक्तियों में से एक है।
यदि वह रक्षा क्षेत्र में अधिक सक्रिय होता है तो भारत को—
रक्षा तकनीक,
सेमीकंडक्टर,
साइबर सुरक्षा,
कृत्रिम बुद्धिमत्ता
जैसे क्षेत्रों में सहयोग के नए अवसर मिल सकते हैं।
लेकिन कुछ सावधानियाँ भी हैं
भारत का हित "जापान के सैन्यवाद" में नहीं बल्कि "जापान के सामरिक सशक्तीकरण" में है।
इतिहास में जापानी साम्राज्यवाद ने एशिया को भारी नुकसान पहुँचाया था। इसलिए भारत सहित कई एशियाई देश नहीं चाहेंगे कि जापान उस दिशा में लौटे।
भारत जिस जापान का समर्थन करता है, वह—
लोकतांत्रिक हो,
पारदर्शी हो,
रक्षात्मक रणनीति अपनाए,
और अंतरराष्ट्रीय नियमों का सम्मान करे।
भारत की वास्तविक रणनीति
भारत की विदेश नीति का मूल उद्देश्य किसी सैन्य गुट का हिस्सा बनना नहीं है।
भारत चाहता है कि—
अमेरिका मजबूत रहे,
जापान सशक्त रहे,
आसियान देशों की भूमिका बनी रहे,
और चीन के साथ भी संवाद जारी रहे।
अर्थात भारत किसी "नए शीत युद्ध" का हिस्सा बनने के बजाय बहुध्रुवीय एशिया चाहता है।
इस बहुध्रुवीय व्यवस्था में जापान एक महत्वपूर्ण स्तंभ हो सकता है।
चीन की दृष्टि से
चीन अक्सर जापान के सैन्य विस्तार को संदेह की दृष्टि से देखता है।
यदि जापान की रक्षा क्षमता बढ़ती है तो बीजिंग इसे अपने प्रभाव को सीमित करने के प्रयास के रूप में देख सकता है।
भारत को इस संतुलन को सावधानी से संभालना होगा ताकि सहयोग बढ़े लेकिन अनावश्यक टकराव न हो।
निष्कर्ष
भारत के हित में "सैन्यीकृत जापान" नहीं बल्कि "सशक्त और जिम्मेदार जापान" है।
भारत को ऐसा जापान चाहिए जो—
हिंद-प्रशांत में स्थिरता बनाए रखे,
चीन के सामने संतुलनकारी भूमिका निभाए,
तकनीकी और रक्षा सहयोग बढ़ाए,
और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को मजबूत करे।
इसलिए यदि "सैन्यीकरण" का अर्थ आक्रामक विस्तारवाद नहीं बल्कि आधुनिक रक्षा क्षमता, समुद्री सुरक्षा और सामरिक आत्मनिर्भरता है, तो ऐसा जापान निश्चित रूप से भारत के दीर्घकालिक हितों के अनुकूल माना जा सकता है।
भारत के लिए मजबूत जापान, मजबूत एशिया का आधार हो सकता है; लेकिन सैन्यवाद नहीं, संतुलित शक्ति ही इस साझेदारी की वास्तविक नींव है।










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