सैन्य तानाशाही का 'मुनाफा': अस्थिरता को हथियार बनाने की त्रासदी


दुनिया के अधिकांश देशों में सेना का कार्य सीमाओं की रक्षा करना और देश को स्थिरता प्रदान करना होता है। लेकिन पाकिस्तान का इतिहास एक ऐसी विडंबना का गवाह है जहाँ सेना देश की रक्षक कम और उसकी नियंता अधिक रही है। आज पाकिस्तान जिस आर्थिक बदहाली, आंतरिक विघटन (बलूचिस्तान, पीओके, पख्तूनिस्तान) और विदेशी जागीरदारी के संकट से जूझ रहा है, वह किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं है। यह उन लोगों की सोची-समझी नीति का परिणाम है, जिन्हें देश को स्थिर रखने का जिम्मा सौंपा गया था। सैन्य तानाशाही के लिए पाकिस्तान का संकट में होना कोई विफलता नहीं, बल्कि एक 'मुनाफे का सौदा' रहा है।

## 1. संकट को 'शक्ति' में बदलने का विज्ञान

सैन्य तानाशाही का अस्तित्व इस बात पर निर्भर करता है कि देश का माहौल कैसा है। यदि देश में शांति, समृद्धि और लोकतंत्र हो, तो सेना का प्रभाव स्वाभाविक रूप से कम हो जाता है। इसलिए, पाकिस्तानी सेना ने एक 'पावर-प्रॉफिट मॉडल' विकसित किया है:

 * **भय का विपणन (Marketing of Fear):** सेना ने हमेशा 'भारत का डर' और 'आंतरिक विद्रोह का भय' दिखाकर जनता को डराए रखा है। जब जनता डरी हुई होती है, तो वह सुरक्षा के लिए सेना की ओर देखती है। यही वह क्षण है जब तानाशाही अपनी जड़ों को गहरा करती है।

 * **दमन का कानूनी कवच:** बलूचिस्तान और पीओके जैसे क्षेत्रों में जब विद्रोह होता है, तो सेना को 'राष्ट्र की अखंडता' के नाम पर दमन करने का असीमित अधिकार मिल जाता है। यह उनके लिए नागरिक संस्थाओं को कुचलने का सबसे सटीक बहाना है।

## 2. 'जागीरदारी' का आर्थिक लाभ

पाकिस्तान का महाशक्तियों (विशेषकर चीन और अमेरिका) के हाथों में 'जागीर' बनना सेना के शीर्ष नेतृत्व के लिए व्यक्तिगत और संस्थागत मुनाफे का मार्ग है।

 * **रक्षा बजट और व्यवसाय:** पाकिस्तान में सेना का अपना एक विशाल व्यापारिक साम्राज्य है—जिसे 'फौजी फाउंडेशन' के नाम से जाना जाता है। देश का एक बड़ा बजट रक्षा मद में जाता है, जो सीधे सेना के इन व्यावसायिक उपक्रमों में निवेश होता है।

 * **विदेशी सहायता का निजीकरण:** जब चीन CPEC के तहत निवेश करता है या अमेरिका IMF के जरिए कर्ज की मंजूरी देता है, तो इन सौदों की कमान सेना के हाथों में होती है। इस विदेशी धन के बंटवारे में सेना के शीर्ष अधिकारियों का सीधा दखल और कमीशन होता है, जबकि आम जनता कर्ज के बोझ तले दबी रहती है।

## 3. लोकतांत्रिक संस्थानों का सुनियोजित विनाश

सैन्य तानाशाही के लिए एक मजबूत लोकतांत्रिक सरकार सबसे बड़ा खतरा है। इसीलिए, पाकिस्तान में कभी कोई चुनी हुई सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाती।

 * **कठपुतली सरकारें:** सेना ऐसी राजनीतिक पार्टियों को सत्ता में लाती है जो उनकी नीतियों की रबर-स्टैम्प बनी रहें। जब जनता का गुस्सा हद से पार हो जाता है, तो सेना उस सरकार को बलि का बकरा बनाकर सत्ता अपने हाथ में ले लेती है या नई कठपुतली नियुक्त कर देती है।

 * **विदेशी गठजोड़:** सैन्य तानाशाह विदेशी महाशक्तियों को यह आश्वासन देते हैं कि "केवल हम ही देश को बिखरने से बचा सकते हैं।" इस 'अस्थिरता की गारंटी' के बदले उन्हें अंतरराष्ट्रीय मान्यता और आर्थिक सहायता मिलती है, जो उनके सत्ता-लोभ को पोषण देती है।

## 4. क्या यह 'मुनाफे का सौदा' हमेशा चलेगा?

इतिहास गवाह है कि किसी भी राष्ट्र की नियति के साथ खिलवाड़ करने वाली तानाशाही अंततः अपना पतन खुद लिखती है। आज पीओके और बलूचिस्तान की सुलगती आग इस बात का संकेत है कि 'भय' अब काम नहीं कर रहा है।

 * **आम जनता की जागृति:** जब जनता के पास खोने के लिए कुछ न हो (बेरोजगारी और महंगाई के कारण), तो वह डरना छोड़ देती है। सैन्य तानाशाही की सबसे बड़ी कमजोरी तब उजागर होती है जब जनता उनके 'भय के एजेंडे' को खारिज कर देती है।

 * **आर्थिक दिवालियापन:** कब तक सेना बाहरी महाशक्तियों से कर्ज मांगकर देश चलाएगी? एक समय ऐसा आता है जब कर्जदाता (चीन/अमेरिका) भी निवेश करना बंद कर देते हैं, क्योंकि उन्हें पता चल जाता है कि पैसा विकास के बजाय भ्रष्टाचार और सेना के ऐशो-आराम में जा रहा है।

## निष्कर्ष

पाकिस्तान की सैन्य तानाशाही का यह 'मुनाफे का सौदा' अंततः देश के लिए एक 'आत्मघाती सौदा' साबित हो रहा है। सेना ने सत्ता और धन की खातिर देश की संप्रभुता को गिरवी रख दिया है। एक ऐसी संस्था जो 'रक्षक' होनी चाहिए थी, वही आज देश के 'विनाश' का सबसे बड़ा कारण बनी हुई है।

पाकिस्तान को यदि बचना है, तो उसे इस 'सैन्य-मुनाफा मॉडल' को उखाड़ फेंकना होगा। यह तभी संभव है जब नागरिक समाज, न्यायपालिका और जनता एक साथ मिलकर सेना को सीमाओं के भीतर रहने के लिए मजबूर करें। अन्यथा, जिस मार्ग पर आज पाकिस्तान चल रहा है, वहाँ से वापसी की उम्मीद धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही है। तानाशाही का मुनाफा, देश की बर्बादी है—यही आज की सबसे कड़वी सच्चाई है।

*यह लेख सैन्य तानाशाही के स्वार्थ और राष्ट्र के हितों के बीच के संघर्ष को स्पष्ट करता है। क्या आप चाहते हैं कि मैं इस विषय पर किसी और विशिष्ट आर्थिक या राजनीतिक बिंदु पर चर्चा करूँ?*


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